अल्लाह हर दिल की पुकार सुनता है : मुफ्ती खालिद अय्यूब

 


तुर्कमानपुर में 'अल्लाह पर यकीन और अच्छा इंसान बनने की राह' विषय पर संगोष्ठी 


गोरखपुर। मकतब इस्लामियात तुर्कमानपुर में  'अल्लाह पर यकीन और अच्छा इंसान बनने की राह'  विषय पर संगोष्ठी हुई। कुरआन-ए-पाक की तिलावत व नात-ए-पाक हाफिज रहमत अली निजामी ने पेश की।


मुख्य वक्ता तहरीक उलमा-ए-हिंद के चेयरमैन मुफ्ती खालिद अय्यूब मिस्बाही ने कहा कि अल्लाह पर यकीन (तवक्कुल) का मतलब है अपना सब कुछ अल्लाह के सुपुर्द कर देना और यह मानना कि जो कुछ भी होता है, उसी की मर्जी से होता है। अल्लाह पर अडिग विश्वास रखना  न केवल मानसिक शांति देता है, बल्कि इंसान को हर मुश्किल परिस्थिति से लड़ने की ताकत प्रदान करता है। हर परेशानी के बाद आसानी आती है। जैसे अल्लाह पक्षियों को भूखा उठाता है पर भूखा सुलाता नहीं, वैसे ही वह अपने बंदों को भी रोजी देता है। अल्लाह हर दिल की पुकार सुनता है और जो हमारे लिए बेहतर है, वही देता है। अल्लाह की मोहब्बत पर जितना ज्यादा यकीन होता है, बंदा खुद को अल्लाह के उतना ही करीब पाता है। 


उन्होंने कहा कि एक अच्छा और नेक मुसलमान बनना जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य होना चाहिए। नेक बनने का अर्थ है अपने मन, वचनों और कर्मों में शुद्धता लाना और दूसरों के प्रति दया और सहानुभूति रखना। यदि आप अपने जीवन में नेक इंसान बनने की राह पर चलना चाहते हैं, तो हमेशा सत्य का साथ दें और अपने कार्यों में पारदर्शी रहें। अहंकार को छोड़ें और दूसरों से बात करते समय अपनी भाषा में मधुरता लाएं। गुस्से और प्रतिशोध की भावना को त्यागकर शांत रहने का प्रयास करें। बिना किसी स्वार्थ के दूसरों की मदद करें। 


अध्यक्षता करते हुए राजस्थान के अरबाज रजा कादरी ने कहा कि दूसरों के दुःख-दर्द को समझें और किसी को मानसिक या शारीरिक ठेस न पहुंचाएं। गलतियों को पकड़कर बैठने के बजाय लोगों को माफ करना सीखें। हमेशा चरित्रवान, सकारात्मक और अच्छे विचारों वाले लोगों के साथ रहें। अपने दैनिक कार्यों और दिनचर्या को व्यवस्थित और अनुशासित रखें। केवल अच्छा दिखने या कहलाने के बजाय सचमुच भीतर से नेक बनें।


संगोष्ठी में कारी मुहम्मद अनस नक्शबंदी, जीशान, रूशान, अब्दुस्समद, मुहम्मद शाद, सफियान, रौशन अली, मुहम्मद जैद, रहमत अली, जैनुल आबिदीन, मुहम्मद आबिद, मुहम्मद सैफ, जलालुद्दीन, शिफा खातून, सना फातिमा, फिजा खातून, शालिबा, मुबस्सिरा, खुशी, फिजा खातून, सानिया, अदीबा सहित तमाम लोगों ने हिस्सा लिया।

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मुहर्रम के चांद के साथ होगा 1448 हिजरी का आगाज 


गोरखपुर। इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना मुहर्रम है। माहे मुहर्रम का चांद मंगलवार 16 जून की शाम को देखा जाएगा। चांद के दीदार के साथ 17 या 18 जून से 1448 हिजरी का आगाज होगा। इसी के साथ नया इस्लामी साल शुरु होगा। हिजरी सन् का आगाज मुहर्रम महीने से होता है। यौमे आशूरा यानी दसवीं मुहर्रम 26 या 27 जून को पड़ेगी।


चिश्तिया मस्जिद बक्शीपुर के इमाम मौलाना महमूद रजा कादरी ने बताया कि मुहर्रम की पहली तारीख को मुसलमानों के दूसरे खलीफा अमीरुल मोमिनीन हजरत सैयदना उमर रदियल्लाहु अन्हु की शहादत हुई। मुहर्रम को इस्लामी इतिहास की सबसे दुखद घटना के लिए याद किया जाता है। इसी महीने में यजीद नाम के एक जालिम बादशाह ने पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के प्यारे नवासे हजरत सैयदना इमाम हुसैन रदियल्लाहु अन्हु व उनके साथियों को कर्बला के मैदान में शहीद कर दिया था।


सब्जपोश हाउस मस्जिद जाफरा बाज़ार के इमाम हाफिज रहमत अली निजामी ने कहा कि मुहर्रम दीन-ए-इस्लाम के मुबारक महीनों में से एक है। इस माह में रोजा रखने की खास अहमियत है। विभिन्न हदीसों व अमल से मुहर्रम की पवित्रता व इसकी अहमियत का पता चलता है। मुहर्रम के दसों दिन खुसूसन आशूरा (दसवीं मुहर्रम) के दिन महफिल या मजलिस करना और सही रवायतों के साथ हजरत सैयदना इमाम हुसैन व कर्बला के शहीदों के फजाइल और कर्बला का वाक़यात बयान करना जायज व बाइसे सवाब है। जिस मजलिस में सालिहीन का जिक्र होता है वहां रहमत बरसती है। दसवीं मुहर्रम को फातिहा-नियाज करना, लोगों को पानी व शरबत पिलाना, मिस्कीन मोहताजों को खाना खिलाना, परेशान लोगों की परेशानी को दूर करना सवाब का काम है। नौवीं व दसवीं मुहर्रम का रोजा रखना अफज़ल है। शरीअत के दायरे में रहकर ही कोई काम करें। कुरआन ख्वानी, फातिहा ख्वानी व दुआ ख्वानी करें। पौधा रोपण करें। अमन ओ अमान कायम रखने में प्रशासन की मदद करें।


समाजसेवी नेहाल अहमद ने बताया कि माहे मुहर्रम शुरू होते ही प्रमुख मस्जिदों व घरों में कर्बला के शहीदों की याद में महफिल व मजलिस शुरु होगी। इमामबाड़ा इस्टेट मियां बाजार में तैयारी जारी है। यहां से 5, 9 व 10 मुहर्रम को शाही जुलूस निकाले जाने की परम्परा है। इसके अलावा जिले के विभिन्न मोहल्लों में स्थित इमाम चौकों से चौथी से दसवीं मुहर्रम तक भी जुलूस निकाला जाता है।

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