जिसके कदमों से जन्नत बनी करबला...उस हुसैन इब्ने हैदर पे लाखों सलाम

जिसके कदमों से जन्नत बनी करबला...उस हुसैन इब्ने हैदर पे लाखों सलाम


गोरखपुर।

टूटे हुए दिलों का सहारा हुसैन है। डूबे न जो फलक पे वह तारा हुसैन है।।
अहले खि़रद समझ न सके क्या हुसैन है।
नाना के जिस्मे पाक का साया हुसैन है।
ईमान और कुफ्र में निस्बत कोई नहीं।
दुनिया है रात और सवेरा हुसैन है।। यह भी तुम्हें ख्याल न आया यजीदियों।
सरकारें दो जहां का नवासा हुसैन है।।
 होकर शहीद, जिन्दगी- ए- जाविंदा मिली।
जिन्दा था और आज भी जिन्दा हुसैन है।। // //

जिसको झूला फरिशते झूलाते रहे। लोरियां दे के नूरी सुलाते रहे। जिसको सीने से आका लगाते रहे। उस हुसैन इब्ने हैदर पे लाखों सलाम।
तीन दिन भूखा-प्यासा जो रखा गय। जो रहा पैकरे शाने सब्र व रज़ा। जिससे राजी था लारैब उसका खुदा। जिसके कदमों से जन्नत बनी करबला। उस हुसैन इब्ने हैदर पे लाखों सलाम//

ऐ करबला की खाक़! उस एहसान को न भूल। तड़पी है तुझ पे लाशे जिगर गोशए रसूल। इस्लाम के लहू से तेरी प्यास बुझ गई। सैराब कर गया तुझे खूने रगे रसूल।// तेरी कुर्बानी ने जिन्दा कर दिया इस्लाम को। वह रहेगा ता अबद तेरी बदौलत ऐ हुसैन!

मिल्लते इस्लाम को मिलता है एक दर्से ह्या! कैसे भूलें हम तेरा यौमे शहादत ऐ हुसैन! हाल मेरा कुछ भी हो, मेरा अकीदा है यही! बख्शवाएगी मुझे तेरी मोहब्बत ऐ हुसैन।///



मर्दें हक बातिल से हरगिज खौफ खा सकता नही। सर कटा सकता है लेकिन सर झूका सकता नहीं।// बैअत न की कुबूल, मगर सर कटा दिया। ऐसा जहां में कौन है जैसा हुसैन है।। जन्नत का फूल सैयदे कौनैन के लिए। और फातिमा की आंख का तारा हुसैन है।। बज्में रसूले पाक में, देखा है राज ने। सरकार हैं चिराग, उजाला हुसैन है।

कल मुहर्रम की दसवीं तारीख है। इस तारीख को जब तक दुनिया बाकी है भुला नहीं सकती है। इस दिन हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि व आलही वसल्लम के नवासे हजरत हुसैन ने 28 अक्टूबर सन् 681 हिजरी में अपने 91 अफराद जिसमें 19 अपने अहले बैत व 72 जांनिसार साथियों के साथ एक अजीम कुर्बानी दी। इस्लाम को बचाया।


हुसैन की अजमत को सलाम। हुसैन की इमामत को सलाम। हुसैन की शहादत को सलाम। हुसैन की कयादत को सलाम। हुसैन की सदाकत को सलाम। शहीदे करबला की मोहब्बत को सलाम।

करबला की जंग अजीबो गरीब माहौल में हुई। मुकाबला किसका था? हकीकत तो यह है कि मुकाबला इमाम हुसैन और यजीद पलीद का नहीं। मुकाबला हक और बातिल का था। मुकाबला शरीअत और तबियत का था। मुकाबला जन्नती और जहन्नमी का था। एक तरफ भरोसा खुदा की जात पर था। और दूसरी तरफ भरोसा जंगी साजो सामान पर था। एक तरफ 91 जांनिसार इस्लाम को बचाने की फिक्र में थे। दूसरी तरफ बाइस हजार का लश्कर कुरान व सुन्नत को मिटाने के लिए तैयार था। एक तरफ जिक्रे इलाही हो रहा था। दूसरी तरफ शराब पिलायी जा रही थी।

अब आपको करबला के खूनी मैदान में ले चल रहा हूं। जिसका जर्रा-जर्रा या हुसैन या हुसैन का नारा लगा रहा था और दूसरी तरफ यजीदी लश्कर खून-ए-हुसैन के लिये बेकरार था। अली अकबर शहीद हो चुके है। अभी इमाम हुसैन शहीद अली अकबर की लाश जमीन पर रख ही रहे थे कि हजरत जैनब तड़पती हुई अली असगर को गोद में लिये तशरीफ लायी और अर्ज करती है कि भाई हुसैन भूख और प्यास की शिद्दत ने बच्चे को कितना बेबस कर दिया है ऐसा न हो कि चमनिस्ताने फातिमा की कलीं चटकने से पहले ही साखें गुल से टूट जायें। छः माह के अली असगर के भूख प्यास से तड़पता देख हुसैन उसे यजीद के लश्कर के सामने ले गये और कहा कि तुम्हारी दुश्मनी तो मुझसे है इस नन्हें से फरिश्तें ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? लेकिन जालिमों को उस छः माह के बच्चे पर तरस न आया और यजीदियों ने एक तीर चलाकर उस बच्चे को शहीद कर दिया। हजरत हुसैन पर क्या गुजरी यह बयां से बाहर है।

दसवीं मुहर्रम को सुबह से दोपहर तक खानदाने नुबूवत के तमाम चश्मो चिराग एक-एक कर शहीद हो गये। हर तडपती लाश की आखिरी हिचकी पर इमाम आली मकाम मैदान में पहुंचे गोद में उठा लिया। खेमे तक ले आये। जिगर के टुकडे भी है आंखें के तारे भी है बीबी जैनब के दुलारे भी।

तीन दिन का भूखा प्यासा शेर बाइस हजार के लश्कर में तीरों की बारिश हो रही है। इसके बावजुद हजरत अली का लख्ते जिगर शुजाअत का जौहर दिखा रहे है और एक एक बार में कई जहन्नमीयों के सर कलमकर दे रहे है। सय्यदा का दुलारा जैसे ही फर्श-ए-जमीन पर आया कयामत का सीना दहल गया काबा की दीवार हिल गयी। सूरज ने शर्मां के मुहं ढ़ाप लिया। अपने नाना जान की वसीयत पर अम्ल करते रहे कि हुसैन तुम को करबला के तपते हुए रेगिस्तान पर दीन की हिफाजत के लिये तीन दिन व रात भूखा प्यासा रहना पड़ेगा। अपने भतीजे कासिम की पामाल शुदा लाश उठानी पड़ेगी। जैनब के लाल का गम बर्दाश्त करना पडे़गा। छः माह के नन्हें अली असगर की सुखी जबान देखनी पड़ेगी। अली अकबर की जवानी को खाक व खून में देखना पड़ेगा। अब्बास अलमदार के कटे बाजू देखने पडेगें। हुसैन तुम्हारी शहादत के बाद खेमों में आग लगा दी जायेगी।

अहले हरम कैद कर लिये जायेंगे। आबिद बीमार के हाथों में हथकड़िया डाल दी जायेगी और अहले हरम को कुफा शाम के बाजारों में दर बदर फिराया जायेगा। इमाम हुसैन ने यह कुर्बानियां इस्लाम की बका के लिये भूखे प्यासे रह कर दी। इस्लाम को अपने व अपने अहले बैत जांनिसारों के खून से सींचा। और सर तन से जुदा होते वक्त भी शुक्रे अदा करते हुए सज्दे की हालत में फानी दुनिया से कूच फरमाया। इस्लाम की तालीम को जिंदा रखा कि बातिल के आगे सर कट तो सकता है लेकिन सर झूक नहीं सकता। ख्वाजा गरीब नवाज ने इमाम हुसैन की शान में बेमिसाल रूबाई पेश की।

शाह अस्त हुसैन, बादशाह अस्त हुसैन,

दीन अस्त हुसैन, दीं-पनाह अस्त हुसैन,

सर दाद, न दाद दस्त, दर दस्ते यज़ीद

हक़्का कि बिनाए ला-इलाहा अस्त हुसैन।

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