गोरखपुर। नौवीं मुहर्रम को अकीदतमंदों ने अलग-अलग तरीकों से हजरत सैयदना इमाम हुसैन व शुहदाए कर्बला को खिराजे अकीदत पेश किया। उलमा किराम ने हजरत इमाम हुसैन व शुहदाए कर्बला की जिंदगी व तालीमात पर रोशनी डाली। इमाम हुसैन, अहले बैत व कर्बला के शहीदों की याद में कुरआन ख्वानी, फातिहा ख्वानी व दुआ ख्वानी हुई। जिन लोगों ने नौवीं मुहर्रम को रोजा रखा था उन्होंने शाम को रोजा खोलकर अल्लाह का शुक्र अदा करते हुए इबादत की। अकीदतमंदों ने घर व मस्जिद में कुरआन-ए-पाक की तिलावत की। अल्लाह का जिक्र किया। दुरूदो सलाम का नजराना पेश किया। पूरा दिन हजरत इमाम हुसैन की कुर्बानियों को याद करते हुए बीता।
नौवीं मुहर्रम को हुआ रहमतनगर में सामूहिक रोजा इफ्तार
नौवीं मुहर्रम को गौसे आजम फाउंडेशन की ओर से सुन्नी बहादुरिया जामा मस्जिद रहमतनगर में सामूहिक रोजा इफ्तार का आयोजन हुआ। जिसमें अकीदतमंदों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। रोजा इफ्तार में फाउंडेशन के जिलाध्यक्ष समीर अली, मौलाना अली अहमद, मुहम्मद फैज, हाफिज मुहम्मद शारिक, अमान अहमद, रियाज अहमद, सैयद शहाबुद्दीन, जुनैद खान, मुहम्मद जैद आदि शामिल हुए।
आज पूरी दुनिया इमाम हुसैन को याद कर रही है : मुहम्मद अनस
महफिल ‘जिक्रे शुहदाए कर्बला’ के तहत नौवीं मुहर्रम को मकतब इस्लामियात चिंगी शहीद इमाम चौक तुर्कमानपुर में मुहम्मद अनस ने कहा कि मुहर्रम बरकत व अजमत वाला महीना है। मुहर्रम की 10वीं तारीख जिसे आशूरा कहा जाता है वह बहुत ही फजीलत वाली है। इसी दिन इमाम हुसैन व उनके साथियों को शहीद किया गया। तारीख गवाह है कि आज तक दुनिया में हजारों जंगें हुईं। उन सारी जंगों को लोगों ने एकदम से भुला दिया मगर मैदाने कर्बला में हुई हक व बातिल की जंग रहती दुनिया तक याद रखी जाएगी।
उन्होंने कहा कि इमाम हुसैन का मकसद दुनिया को दिखाना था कि अगर इंसान सच्चाई की राह पर साबित कदम रहे और सहनशीलता का दामन न छोड़े तो उसे कामयाब होने से कोई नहीं रोक सकता है। आज इमाम हुसैन को पूरी दुनिया याद कर रही है।
तुर्कमानपुर न्यू कॉलोनी में हाफिज रहमत अली ने कहा कि अल्लाह की रजा के लिए अपने आपको और अपनी औलाद को कुर्बान करना और उस पर सब्र करना हजरत इमाम हुसैन और उनके हौसले की ही बात थी। हजरत इमाम हुसैन ने धर्म व सच्चाई की हिफाजत के लिए खुद व अपने परिवार को कुर्बान कर दिया, जो शुहदाए कर्बला की दास्तान में मौजूद है। हम सब को भी उनके बताए रास्ते पर चलने की जरूरत है। कर्बला की जंग मंसब नहीं इंसानियत की जंग थी। यही वजह है कि इमाम हुसैन ने उस जंग में अपने पूरे खानदान को कुर्बान तो कर दिया मगर जालिम यजीद जो बातिल और बुराई का प्रतीक था, उससे समझौता नहीं किया। दुनिया में कोई ऐसा इंसान नहीं है जो अपने बच्चे, जवान और बुजुर्ग सभी को अल्लाह की रजा की खातिर कुर्बान कर दे। साथ ही साथ हर हाल में अल्लाह का शुक्र अदा करता रहे। हमें प्रण लेना चाहिए कि हम अपनी पूरी जिंदगी इमामे हुसैन के नक्शे कदम पर चलकर गुजारेंगे, तभी हमें कामयाबी मिलेगी। इमाम हुसैन दीन-ए-इस्लाम को बचाने के लिए शहीद हुए। इमाम हुसैन ने कर्बला में शहादत देकर बता दिया कि जुल्म दीन-ए-इस्लाम का हिस्सा नहीं है।
सुन्नी बहादुरिया जामा मस्जिद रहमतनगर में मौलाना अली अहमद ने कहा कि पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ‘खुतबा हज्जतुल विदा’ में फरमाया है कि ऐ लोगों मैंने तुममें वह चीज छोड़ी है कि जब तक तुम उनको थामें रहोगे, गुमराह न होगे। पहली चीज ‘अल्लाह की किताब’ और दूसरी ‘मेरे अहले बैत'। इमाम हुसैन की जंग हुकूमत हासिल करने के लिए नहीं बल्कि इंसानों को सही रास्ते पर लाने के लिए थी। इमाम हुसैन की अजमतों को लाखों सलाम जान तो कुर्बान कर दी लेकिन रूहे इस्लाम बचा ली।
गुलशने रजा एकेडमी तुर्कमानपुर में आलिमा सबीहा खातून ने कहा कि इमाम हुसैन व उनके जांनिसारों ने कर्बला की तपती रेत पर भूखे प्यासे रहकर अजीम कुर्बानियां पेश की। 10वीं मुहर्रम (आशूरा) के दिन रोजा रखना, सदका करना, नफ्ल नमाज पढ़ना, एक हजार मर्तबा सूरह इख्लास पढ़ना, यतीमों के सर पर हाथ रखना, घर वालों के लिए अच्छा खाना बनवाना, सुरमा लगाना, गुस्ल करना, नाखून तराशना और मरीजों की बीमार पुर्सी करना, इमाम हुसैन व कर्बला के शहीदों के लिए फातिहा-नियाज करना अच्छा काम है। खिचड़ा और सबीले इमाम हुसैन वगैरा बांटने में सवाबे खैर है। दसवीं मुहर्रम को गुस्ल करें, क्योंकि उस रोज जमजम का पानी तमाम पानियों में पहुंचता है।
उन्होंने कहा कि इमाम हुसैन के पुत्र इमाम जैनुल आबेदीन जो कर्बला के मैदान में बीमारी की हालत में मौजूद थे, उन्होंने कर्बला में तमाम शहादतों के बाद वहां से शाम तक के सफर में अपने खुतबों से इमाम हुसैन के मिशन को आगे बढ़ाया। अंत में दुरूदो सलाम पढ़कर मुल्क में अमन व अमान की दुआ मांगी गई।
इमाम चौकों पर रखी गई ताजिया
नौवीं मुहर्रम को हजरत सैयदना इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत को याद करते हुए शाम के समय तमाम इमाम चौकों पर छोटे-बड़े ताजिया रख कर फातिहा पढ़ी गई। इमाम चौकों पर शरबत व मलीदा पर भी फातिहा हुई। हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों के वसीले से दुआ व मन्नत मांगी गई। विभिन्न इमाम चौकों व घरों में मलीदा, शर्बत, खिचड़ा व बिरयानी बनाकर अकीदतमंदों में बांटा गया। अकीदतमंदों ने इमाम चौकों पर बड़े ताजिया के साथ छोटे ताजिया मन्नत के तौर पर रखे। कई क्षेत्रों में अकीदतमंद छोटी-छोटी ताजिया खरीदते दिखे। मियां बाजार स्थित इमामबाड़ा व जाफरा बाजार स्थित कर्बला में फातिहा ख्वानी के लिए अकीदतमंदों की भीड़ उमड़ी। जुलूसों का सिलसिला भी जारी रहा। देर रात तक लाइन की ताजिया का जुलूस निकलता रहा। देश विदेश की मस्जिदों व दरगाहों का अक्स ताजिया में नजर आया। एक से बढ़कर एक ताजिया सड़कों पर नजर आई। लाइन की ताजिया का केंद्र गोलघर रहा। लोग मोबाइल में ताजिया की फोटो व वीडियो कैद करते दिखे।


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