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देशप्रेमी हाजी खादिम हुसैन की खिदमात

देशप्रेमी हाजी खादिम हुसैन की खिदमात जंगे आजादी के लिए कुर्बान कर दिए 12 गांव व नौकरी गोरखपुर। 1857 की पहली जंगे आजादी हो या इसके बाद की लड़ाई हिन्दुस्तान के बाशिंदों ने सब्र का दामन नहीं छोड़ा। जिदंगी, दौलत समेत तमाम कुर्बानियां दी। जिसका नतीजा है कि आज हम खुली अंग्रेजों की गुलामी से आजाद है। बहुत से ऐसे थे जिन्हें खूब शोहरत मिली। कुछ ऐसे थे जिनकी खिदमात कोई नहीं जानता। ऐसे लोगों की तादाद ज्यादा है। एक ऐसी शख्सियत हैं तिवारीपुर (औलिया चक) के रहने वाले हाजी खादिम हुसैन सिद्दीकी। जो आलिमें दीन भी थे और सच्चे देशभक्त भी। इनके पूर्वज शेख सनाउल्लाह लंग पहलवान (दादा औलिया) रहमतुल्लाह अलैह मुगल शहंशाह औरंगजेब के शासन काल में गोरखपुर आये। शहंशाह औरंगजेब ने एक सनद लिख कर इनके पूर्वजों को दी थी। जिसके तहत इन्हें चैदह गांव मिला था। इसके अलावा अन्य सम्पत्तियां भी मिली। जब महात्मा गांधी ने 1920 में असहयोग आंदोलन चलाया तो आप भी उसमें शामिल हुये। आपने सरकारी नौकरी छोड़ दी। उस समय के अंग्रेज प्रशासन ने उन्हंे चेतावनी दी की। अगर आपने इस आंदोलन में हिस्सा लिया तो आपका सारा गांव जब्त कर लिया जायेगा। आपने अ...

इस ईद पर मस्तानी इयरिंग होगा खास

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ईद के लिए महिलाएं जूलरी चूडियां मेहंदी और जूतियों की जमकर कर रही हैं शॉपिंग । ईद आने को चंद ही दिन बाकी हैं ऐसे में महिलाएं अपने सजने-संवरने के इंतजाम में जोर.शोर से लगी हुई हैं। ईद से चंद दिन पहले महिलाओं की खरीदारी का मिक्स एंड मैच टाइम शुरू हो गया है। गोलघर रेती चैक नखास माया बाजार जाफरा बाजार गोरखनाथ और उर्दू बाजार जैसे मुख्य बाजारों में ईद की शॉपिंग के लिए इफ्तार के बाद महिलाओं की अच्छी खासी भीड उमड़ रही है। इस ईद पर मस्तानी इयरिंग खास कर यूथ गल्र्स काफी पसंद कर रही हैं। यह इयरिंग दीपिका पादुकोण फिल्म बाजीराव मस्तानी में पहनी दिखी थीं। रेती चैक में यह चांद इयरिंगष् काफी डिमांड में है। कई रंगों में मिल रहे इयरिंग को यूथ अपने ड्रेस से मैच कर ही खरीद रहे हैं। इसकी कीमत 300 से 550 रुपए तक है। दुकानदार शोहरत ने बताया कि इस ईद पर चांद इयरिंग काफी डिमांड में है जिसे मुंबई से मंगवाए गए हैं। उन्होंने बताया कि कस्टमर के डिमांड पर इसे मंगाया गया है। हैदराबाद की ज्वैलरी सेट स्पाइरल जैसी डिजाइन और कॉपर कलर वाली मेटल ज्वैलरी सेट इस ईद पर मार्केट में अच्छी खासी डिमांड में हैं। हैदराबाद के ये...

सत्तर हजार फरिश्तें दुआ.ए.मगफिरत करते है

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गोरखपुर। मुफ्ती अख्तर हुसैन अजहर मन्नानी ने दीनी किताबों के हवाले से बताया कि पैगम्बर मोहम्मद साहब का फरमान है कि जब माहे रमजान की पहली रात आती है तो आसामनों और जन्नत के दरवाजे खोल दिए जाते है और आखिरी रात तक बंद नहीं होते। जो कोई बंदा इस माहे मुबारक की किसी ऽाी रात में नमाज पढता है तो अल्लाह उसके हर सज्दे के एवज यानी बदले में उसके लिए सतरह सौ नेकियां लिखता है ओर उसके लिए जन्नत में सूर्ख याकूत का घर बनाता है। जिस में सत्तर हजार दरवाजे होंगे। और हर दरवाजे के दोनों पट सोने के बने होंगे। जिन में याकूते सूर्ख जड़े होंगे। पस जो कोई माह रमजान का पहला रोजा रखता है तो अल्लाह महीने क महीने के अािखरी दिन तक उसके गुनाह माफ फरमा देता है और दूसरे रमजान तक उसे कफफारा हो जाता है। और हर वो दिन जिस में ये रोजा रखेगा और उस ही रोजे के बदे में उसे एक हजार सोने के दरवाजे वाला महल जन्नत में अता होगा और उसके लिए सुबह से शाम तक सत्तर हजार फरिश्तें दुआ.ए.मगफिरत करते रहेेंगे। रात और दिन में जब ऽाी वो सज्दा करेगा उस हर सज्दे के इवज यानी बदले उसे जन्नत में एक ऐसा दरख्त अता किया जाएगा कि अगर उसके नीचे एक घोड़ा ...

गोरखपुर की ऐतिहासिक ईदगाहें जहां बंटता है खुदा का फज्ल

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शहर की ऐतिहासिक ईदगाहेंए जहां बंटता है खुदा का फज्ल गोरखपुर। शहर की ईदगाहे ऐतिहासिक है। जहां ईद व ईदुलअज्हा के दिन खुदा का फज्ल बंदों पर खास होता है। ईद में चंद दिनें बचे है। ईदगाहों में तैयारी जोर.शोर से चल रही है। रंग रोगनए साफ सफाई के लिए मजदूर लगे हुये है। मुंशी प्रेमचन्द की कालजयी रचना ईदगाह सऽाी के जेहन में महफूज है। यह कहानी प्रेमचन्द ने ईदगाह मुबारक खां शहीद के जेरे नजर लिखी। बेहितहाता स्थित मुंशी प्रेमचन्द पार्क जहां पर प्रेमचन्द निवास करते थे। वहीं सामने ईदगाह मुबारक खां शहीद स्थित है। यहीं से उन्हें ईदगाह कहानी लिखने की प्रेरणा मिली। यहीं से उन्हें हामिद पात्र मिला जो अपनी दादी के लिये लोहे का चिमटा ले जाता है। एक बार कहानी पढ़ लेंगे तो ऽाावनात्मक रुप से आपका जुड़ाव उन पात्रों से हो जायेगा जिन्हें प्रेमचन्द ने अपने कहानी में रखा है। इस सब कहने का हासिल शहर की ईदगाहों से आपको रूबरू कराना है। पाक रमजान के माह में आप शहर की ईदगाहों के बारे में जानिए। साल में दो बार यहां पर कसीर तादाद में लोगों का जमवाड़ा होता है। लोग शुक्रें खुदा करते है। एक दूसरे से गले मिलते है। हाथ मिलाते है...

मुगल शहंशाह औरंगजेब ने बनवायी थी ईदगाह बेनीगंज

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सैयद फरहान अहमद गोरखपुर। शहर.ए.गोरखपुर में कई ऐतिहासिक धरोहर मौजूद है। जो अनमोल है। इन्हीं धरोहरों में रूद्रपुर स्थित एक है ईदगाह बेनीगंज। जिसे बनाने का हुक्म मुगल शहंशाह औरंगजेब ने करीब सवा तीन सौ बरस पहले अपने द्वितीय पुत्र मुअज्जम अली शाह को दिया। मुगलवास्तुकला की बेजोड़ निशानी है। ईदगाह में तीन दरवाजे है। एक मिम्बर और छोटी मीनारें अपने अतीत की यादों को अपने अंदर समेटे हुये है। इस ईदगाह में एक साथ पन्द्रह हजार लोग नमाज पढ़ सकते है। इसके मुतवल्ली जुनैद के पास औरंगजेब की लगी मोहर के कागजात मौजूद है। ईदगाह के सेके्रटरी इसरार अहमद ने बताया कि इस ईदगाह में वहीं सामान लगे है जो जामा मस्जिद उर्दू बाजार की तामीर में लगा हुआ है। उन्होंने बताया कि इसकी तामीर में कड़वा तेल ए दालए चूनाए सूर्खी व उस जमाने की ईट का प्रयोग हुआ है। इसके अंदर एक कुआं है। इसके आसपास सात कुएं है। हालांकि कुओं का अस्तीत्व समाप्त हो चुका है। ईदगाह की लम्बाई दो सौ स्कवायर मीटर व चौड़ाई एक सौ अस्सी मीटर है। इस ऐतिहासिक ईदगाह में दो गेट है। एक गेट शहंशाह औरंगजेब का बनवाया है। एक गेट आवाम की मदद से कमेटी ने बनवाया। उन्हों...

सय्येदुना उमरे फारूक की ईद

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इस्लाम धर्म के दूसरे खलीफा जिनके तकवा परेहजगारी का यह आलम था कि ईद के दिन जारों कतार रो रहे है। ईद क दिन लोग काशान-ए-खिलाफत पर हाजिर हुए तो क्या देखा कि आप हजरत उमर दरवाजा बन्द करके जारो कतार रो रहे है। लोगों न हैरान होकर तअज्जूब से अर्ज किया, या अमीरूल मोमिनीन! आज तो ईद का दिन है। आज तो शादमानी मुसर्रत और खुशाी मनाने का दिन है। ये खुशी की जगह रोना कैसा? आप ने आंसू पेांछते हुए फरमाया ऐ लोगों! ये ईद का दिन भी है और वईद का दिन भी है। आज जिस के नमाज रोजा मकबूल हो गए बिला शुब्ह उस के लिए आज ईद का दिन है। लेकिन आज जिस की नमाज रोजा को मरदूह करके उसके मुहॅं पर मार दिया गया हो उस के लिए तो आज वईद ही का दिन है। और मैं तो इस खौफ से रो रहा हूॅं कि आह! यानी मुझे ये मालूम नहीं कि मैं मकबूल हुआ हॅंूं या रद्द कर दिया गया हॅंू।

शहजादे की ईद

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हजरते सय्येदुना उमर ने एक मरतबा ईद के दिन अपने शहजादे को पुरानी कमीस पहने देखा तो रो पड़े, शहजादे ने अर्ज़ किया, प्यारे अब्बा जान! आप किस लिए रो रहे हैं? आपने फरमाय, बेटे मुझे अन्देशा है कि आज ईद के दिन जब लड़के तुझे इस फटे पुराने कमीस में देखेंगे तो तेरा दिल टूट जाएगा। शहजादे ने जवाबन अर्ज किया ‘‘ दिल तो उसका टूटे जो रजाए इलाही को न पा सका या जिसने माॅं या बाप की नाफरमानी की हो और मुझे उम्मीद है कि आप की रजामंदी के तुफैल अल्लाह तआला भी मुझे से राजी होगा।’’ यह सुनकर हजरते उमर रो पड़े। शहजादे को गले लगाया और उस के लिए दुआ की।

शहज़दियों की ईद

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अमीरूल मोमिनीन हजरते उमर बिन अब्दुल अजी़ज की खिदमत में ईद से एक दिन कब्ल आप की बच्चियाॅं हाजिर हुई और बोली ‘‘ बाबा जान कल ईद के दिन हम कौन से कपड़े पहनेंगी?’’ फरमाया ‘ यही कपड़े जो तुम ने पहने रखे हैं इन्हें आज धो लो और कल पहन लेना।’’ ‘‘नहीं बाबा जान! आप हमें नए कपड़े बनवा दें।’’ बच्चियों ने जिद करते हुए कहा। आप ने फरमाया। मेरी बच्चियों! ईद का दिन अल्लाह की इबादत करने और उसका शुक्र बजा लाने का दिन है नए कपड़े पहनना जरूरी तो नहीं। ‘‘ बाबा जान! आप का फरमान बेशक सही और दुरूस्त है लेकिन हमारी सहेलियाॅं और दूसरी लड़कियाॅं हमें ताने देंगी कि तुम अमीरूल मोमिनीन की लड़कियाॅं हो और वही पुराने कपड़े पहन रखे।’’ बच्चियों की बातें सुनकर अमीरूल मोमिनीन का दिल भी भर आया। आप ने ख़ाजिन को बुलाकर फरमाया मुझे मेरी एक माह की तनख्वाह पेशगी लादो। खाजिन ने अर्ज किया कि हुजूर क्या आप को यकीन है कि आप एक माह तक जिन्दा रहेंगे? आप ने फरमाया तूने बेशक उम्दा और सही बात कही। खाजिन चला गया। आप ने बच्चियों से फरमाया प्यारी बच्चियों! अल्लाह व रसूल की रिजा पर अपनी ख्वाहिशात का कुरबान कर दो। कोई शख्स उस वक्त जन्नत का मुस्...

हुजूर गौसे आजम की ईद

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अल्लाह के मकबूल बन्दों की एक एक अदा हमारे लिए मोजिबे सद दर्सें इब्रत होती है। देखिए हमारे हुजूर गौसे आजम की शान कितनी जबरदस्त और अरफअ व आला है लेकिन बावजूद इतनी बड़ी शान होने के हमारे लिए आप क्या चीज पेश फरमाते है। पढ़िए और इब्रत हासिल कीजिए। ख़ल्क़ गोयद कि फरदा रोजे़ ईद अस्त। खुशी दर रूहे हर मोमिन पदीद अस्त। दराॅं रोजे़ कि बा ईमाॅं ब-मीरम। मिरा दर मुल्के खुदआॅं रेाजे़ ईद अस्त। यानि लोग कह रहे है कल ईद है। कल ईद है। और सब खुश हैं लेकिन मैं तो जिस दिन इस दुनिया से अपना ईमान महफ़ूज लेकर गया। मेरे लिए तो वही दिन ईद का होगा। क्या शाने तक्वा है। इतनी बड़ी शान कि ,अवलिया किराम के सरदार और इस कदर तवाजोअ इन्किसार । यह सब कुछ हमारे दर्स के लिए है।

एक वली की ईद

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हजरते शेख नजीबुद्दीन मुतवक्किल हजरत बाबा फरीद के भाई और खलीफा है उनका लकब मुतवक्किल है। ये सत्तर बरस शहर में रहे मगर कोई जाहिरी जरीआ ए माश न होने के बावजूद इनके इयालो अतफाल निहायत इत्तिनान से जिदंगी बसर करते रहे और ये अपने मौला की याद में इस कदर मुस्तगरिक रहते थे कि ये भी नहीं जानते थे कि आज कौनसा दिन है? और ये कौनसा महीना है? एक दफा ईद के दिन आप के घर में बहुत से मेहमान जमा हो गये। इत्तिफाक से उस रोज आप के घर में खाने के लिए कुछ नहीं था। आप बाला खाने पर जाकर यादे इलाही में मशगूल हो गये। और अपने दिल में ये कहते थे कि या अल्लाह! आज ईद का दिन है और मेरे बच्चे और मेहमान भूके है। इस तरह दिल ही दिल में ये कह रहे थे कि अचानक कहीं से एक शख्स छत पर आ गया और उसने खानों से भरा हुआ एक ख्वानपेश किया। और कहा कि ऐ नजीबुद्दीन! तुम्हारे तवक्कुल की धूम मलाओ अअ़ला में मची हुई हैं। और तुम्हारा ये हाल है कि तुम ऐसे यानी खाना तलब करने के लिए ख्याल में मश्गूल हो? आप ने फरमाय कि हक तआला ख्ूाब जानता है कि मैं ने अपनी जात के लिए यह ख्याल नहीं किया, बल्कि अपने मेहमानों के लिए इस ख्याल की तरफ मुतवज्जेह हो गया ...

ईद की रात यानि लैलतुल जाइजा

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हदीस में है कि जब ईदुल फित्र की मुबारक रात तशरीफ लाती है तो इसे ‘लैलतुल जाइजा’ यानी इनआम की रात के नाम से पुकारा जाता है। नबी ने फरमाया रमजान शरीफ के मुबारक महीने के मुतअल्लिक इस महीने का पहला अशरा रहमत, दूसरा अशरा मग्फिरत, तीसरा अशरा जहन्नम से आजादी का है। मालूम हुआ कि ये महीना रहमतो, मगाफिरत और दोजख से आजादी का महीना है। लिहाजा इस रहमत, मगफिरत और दोजख से आजादी के इनआमात की खुशी में हमें ईद सईद की खुशी मनाने का मौका मिला। ईदुल फित्र के दिन खुशी का इजहार करना सुन्नत है। जब ईद की सुब्ह होती है तो अल्लाह अपने मासूम फरिशतों को तमाम शहरों में भेजता है।चुनाॅंचे वो फरिशतें जमीन पर तशरीफ लाकर सब गलियों और राहों के सिरों पर खड़े हो जाते है। ओर इस तरह निदा देते है ऐ उम्मते मुहम्मद उस खुदा की बारगाह की तरफ चलो। जो बहुत ही ज्यादा अता करने वाला और बड़े से बड़ा गुनाह माफ फरमाने वाला है। खुदा फरमाता है ऐ मेरे बन्दों ! मांगों! क्या मांगते हो? मेरी इज्जत व जलाल की कसम! आज के रोज इस नमाजे ईद के इज्तिमाअ में अपनी आखिरत के बारे में जो कुछ सवाल करोगे वो पूरा करूंगा और जो कुछ दुनिया के बारे में माॅंगेागे उसम...

हर हर कदम के बदले में एक एक साल की इबादत का सवाब

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हर कदम पर एक साल की इबादत का सवाब गोरखपुर। हदीस में है कि नबी ए पाक का फरमाने आलीशान है जो माहे रमजान शरीफ में किसी मजलिसे जिक्र में शिरकत करता है। अल्लाह उस के लिखता है और बरोजे कियामत वो अर्श के साए में होगा। और जो कोई रमजान शरीफ में नमाजे बा जमाअत पर मुदावमत करता है याानि हर नमात बा जमाअत ही पढ़ता हैं, अल्लाह तबारक व तआला उस ,खुशनसीब को हर हर रकअत के इवज याानि बदले में नूर का एक शहर अता फरमाएगा। जो कोई माहे रमजान में अपने वालिदैन के साथ एहसान करेगा अल्लाह उसकी तरफ निगाहें रहमत और जमीन में यानि हमारे आका नबी ए पाक उसके जिम्मेदार हों। जो कोई माहे रमजान में किसी मुसलमान की हाजत यानि जरूरत पूरी करता है अल्लाह उसकी दस लाख हाज़ते पूरी फरमाता है। जो इस माहे मुबारक में किसी बाल बच्चेदार फकीर को खैरात देता है अल्लाह उसके लिए दस लाख नेकियाॅं लिखता है और उसके दस लाख गुनाह माफ फरमा देता है और दस लाख दर्जात बुलन्द फरमाता है।

मिश्वाक नबी की सुन्नत

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गोरखपुर। मिश्वाक नबी की सुन्नत है। रमजान में रोजेदार इसका खास ऐहतमाम करते है। रमजान में मिश्वाक की भी डिमाण्ड रहती है जो 10-15 रू. में उपलब्ध है जो राजस्थान की पीलू की लकड़ी से बनता है। मिश्वाक पैगम्बर साहब की पसंदीदा चीज है। रमजान में इसकी बिक्री तेज होती है। वही अरबी रूमालों की बिक्री भी खूब झूम के होती है। अरबी ़रूमाल 50-150 रू. तक की रेंज में मिलते है। यह सारी चीजें नखास चैक पर आसनी से मिल जाती है। इस माह कुरआन शरीफ, दीनी किताबों, नमाज सिखने की किताब की भी खूब मांग रहती है।

कन्नौज के इत्र से महक रहे है रोजेदार

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gorakhpur ... इत्र की खुश्बू सभी को पसंद होती हैं। इस्लाम धर्म में इत्र को खासा स्थान प्राप्त है। पैगम्बर साहब को इत्र से बेहद मुहब्बत थी। वह फरमाते थे कि अगर कोई तुम्हें तोहफे में इत्र दे ंतो कभी इंकार मत करो। इत्र की खुश्बू से रूह को ताजगी मिलती है। वही इबादत में रूहानियत का एहसास कराती है। रमजान माह व ईद में इत्र की डिमाण्ड बढ़ जाती है। महंगाई की मार से इत्र भी महंगी हो चुकी है। इत्र के शौकीनों की जेबों पर अतिरिक्त खर्चों का बोझ बढ़ गया है। पिछले साल की तुलना में इत्र के दामों में 5से15 रू. तक की बढो़त्तरी हुई है। इ़़़त्र के विक्रेता अख्तर ने बताया कि माल भाड़े में बढोत्तरी, इत्र में पड़ने वाले केमिकल के दामों में बेतहाशा वृद्धि आदि के दामों में काफी उछाल आया है। इस समय मजमुआ 5-250रू., फिरदौसी 5-300रू., गुलाब 5-150रू., मुश्क 25-250रू., मुश्क अम्बर 40-200 रू., मैगनेट 35-75 रू., अतर संदल 25-60रू., बहार 25रू.,अतर फवाके सद़फ 25-60रू., अतर हयाती 25-60रू., कश्तूरी 25-50रू, अतर शमामा 40-250 रू. तक बाजार में उपलब्ध है। बाजार में मजमुआ, फिरदौसी,गुलाब, की ज्यादा डिमाण्ड है। उन्होंने बताया कि...

महिलाओं का पसंदीदा बना कराची शूट

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ईद की खरीददारी उरूज पर कहीं कुछ छूट ना जायें गोरखपुर। माहे रमजान का आखिरी अशरा जहन्नम से आजादी का चल रहा है। ईद की खरीददारी जोरों पर है। ईद खुशी का पैगाम लाती है। वैसे तो रमजान के आमद से ही खरीदारी शूरू हेा जाती है। कुर्ता पैजामा, शर्ट पैंट, सलवार सूट के कपड़े पहले से खरीद लिये जाते है। रेडीमेड कपडों की बिक्री चांद रात तक चलती रहती है। आइये हम लिये चलते है उन जगहों पर जो रमजान की खरीदारी के लिए मशहूर है जहाॅं हर रेंज वैराइटी व बजट में फिट आने वाली चीजें मिल जायेंगी। बस आपकी नज़र पारखी होनी चाहिए। रेतीरोड मदीना मस्जिद से लगायत शाहमारूफ, घंटाघर, गीता प्रेस एक दूसरे से सटे हुये। ईद की ज्यादातर खरीदारी लोग यहीं से करना पसंद करते है। क्योंकि यहां गोलघर की अपेक्षा कपड़े सस्ते व बजट में मिल जाते है। अब हम बात करते है शाहमारूफ बाजार की जहाॅ हमेशा चहलपहल बनी रहती है लेकिन रमजान की आमद पर यहां का नजारा बदला-बदला सा नजर आता है। हर किस्म की दुकानें, रेडीमेड कुर्ता पैजामा से लेकर बर्तन तक आपकों उचित रेट में मिल जायेगा। सुबह से शाम यह मार्केट खचाखच भीड़ से पटा रहता है। तिल रखने की जगह नहीं बचती ह...

कलरफुल डिजाइनर कुर्ताें की डिमांड

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गोरखपुर। ईद करीब है। खरीदारी जोरों पर है। दर्जी के पास आर्डर फूल हो चुके है। समय से दे-दे वहंी बड़ी बात। दर्जियों के यहां पर लोग कलर फुल डिजानइन कुर्ता, पठानी सूट, स्टाइलिस कुर्ता, चूड़ीदार कुर्ता पैजामा, हाथ से सिला कुर्ता की डिमांड लेकर आ रहे है। अब दर्जियों ने कुर्ता लेने से इंकार कर दिया है। क्यांेकि आर्डर इतना ज्यादा हो गया है कि समय से पूरा करना मुश्किल हो गया है। अब लोग रेडीमेड कुर्ता पैजामा को तरजीह दे रहे है। भई इबादत के लिए कुर्ता सबकी पहली पसंद है। यह जरुरत पूरी कर रहा है रेडीमेड कुर्ता पजामा। गोरखपुर के युवाओं को इस बार कलरफुल डिजाइनर कुर्ते ही ज्यादा पसंद आ रहे है। इन कुर्ताें की शुरूआत चार सौ रूपए से लेकर एक हजार रूपए तक है। शाहमारुफ में तो अस्थायी कुर्तों का मेला लगा हुआ। ईद को खास बनाने की खुमारी छायी हुई है। शहर में कुर्तों का बाजार सज हुआ है। कुर्ता शाहमारुफ, उर्दू बाजार, घंटाघर, जाफरा बाजार, गोरखनाथ आदि क्षेत्रों में आसानी से में मिल रहा है। इनकी कीमत 350 से 1200 रूपये के आसपास है। वहीं कलकत्ता का कुर्ता भी लोगों को रास आ रहा है। चिकनकारी वाले कुर्ते हमेशा से पसंद ...