संदेश

अक्टूबर, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

हर लबों पर या हुसैन इब्ने अली की सदाएं

चित्र
फातेहाना अंदाज में निकला मियां साहब का शाही जुलूस गोरखपुर। सुबह से सड़कें पर नजर टिकी हुई थी। इंतजार हो रहा था फौज का। सफेद लिबास, खाकी वर्दी, घुड़सवार और सभी के हाथों में फौजियों वाले भाले, बंदूकें, बीच में लकदक सफेद लिबास मंे चल रहे मियां साहब जैसे ही दिखे.....शोर उठा मियां साहब आ गए। अहिस्ता-अहिस्ता कदम बढ़ा रहे मियां साहब को देखने क लिए भीड़ बेताब हो उठी। जुलूस गुजरा तो लोग पीछे-पीछे चलने लगे। एक कारवां चल पड़ा जो कि फिर इमामबाड़ा में ही पहंुच कर समाप्त हुआ। बीते तीन सौ साल की पुरानी रिवायत के मुताबिक निकल रहा इमामबाड़ा स्टेट के मियां साहब का दसवीं का शाही जुलूस पश्चिमी फाटक से सुबह पूरे शानो शौकत से निकला। जुलूस जिधर से भी निकला देखने वाले देखते रह गए। भीड़ इतनी कि गलियांे और छतों एक हो रही थीं। मियां साहब का जुलूस इमामबाड़ा कमाल शाह की मजार पर फाातिहा पढ़ने के बाद जुलूस बक्शीपुर की ओर मुड़ा। जुलूस के सबसे आगे इमामबाड़ा स्टेट का परचम उसके पीछे पैदल सवार हाथांे में भाला लिये सिपाही, घुड़सवार दस्ता, ऊंट और उनके पीछे सफेद वर्दी में अंगरक्षक चल रहे थे। मियंा साहब के निजी सुरक्...

कर्बला का वाकिया तारीख के आईने में

चित्र
मदरसा दारूल उलूम हुसैनिया दीवान बाजार के सहायक अध्यापक मोहम्मद आजम ने किताबों के हवाले से बताया कि हजरत इमाम हुसैन 3 जिलहिज्जा सन् 60 हिजरी को अपने अहले बैत मवाली व खुद्दाम को हमराह ले कर मक्का शरीफ से इराक की तरफ रवाना हो गए। सन् 61 हिजरी मुताबिक सन् 681 ई0का आगाज हो चुका था। मुहर्रम सन् 61 हिजरी 2 तारीख बरोज जुमेरात मुताबिक 20 अक्टूबर के दिन करबला पहुंचे। सातवीं मोहर्रम से जालिमों ने पानी बंद कर दिया। नहरे फुरात पर 500 फौजियों को लगा दिया गया तााकि इमाम हुसैन का काफिला पानी न पी सकें। 9 मुहर्रमुल-हराम सन 61 हिजरी जुमेरात शाम के वक्त इब्न-साद ने अपने साथियों को इमाम हुसैन के कााफिले पर हमला करने का हुक्म दिया। आशूरह मुहर्रम की रात खत्म हुई और दसवीं मुहर्रम सन् 61 हिजरी मुताबिक 28 अक्टूबर सन् 681 ई0 की कयामत नुमा सुबह नमूदार हुई। इमाम हुसैन के अहले बैत व जांनिसार एक-एक कर शहीद हो गए आखिर में हजरत इमाम हुसैन अपने खेमे में तशरीफ लाये। सन्दूक खोला। कुबाए मिस्री जेबे तन फरमाई। अपने नाना जाना हरजत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम का अमाम ए मुबारक सर पर बांधा। सैयदुश्शुहदा हजरत अमीर हमजा रजि...

जिसने इमाम हसन व हुसैन से मुहब्बत की उसने जन्नत पा ली

चित्र
गोरखपुर इमाम हसन व इमाम हुसैन के बारे में हदीस में आया है कि हजरत अबू सईद खुदरी से रिवायत है कि पैगम्बर साहब ने फरमाया हसन और हुसैन जन्नती जवानों के सरदार है। हजरत उसामा बिन जैद फरमाते है कि एक रात में किसी काम से पैगम्बर साहब की खिदमत मंे हाजिर हुआ। तो नबी इस तरह बाहर लाये कि आप किसी चीज को उठाए हुए थे जिसे मैं न जान सका। जब मैं अर्जें हाजत से फारिग हुआ तो दर्याफ्त किया हुजूर यह क्या उठाए हुए है। आपने चादर उठाई तो मैंने देखा कि आपके दोनों पहलुओं में हजरत इमाम हसन और हुसैन है। आपने फरमाया यह दोनों मेरे बेटे और मेरे नवासे है। ऐ अल्लाह! मैं उन दोनों से मुहब्बत करता हंू तू भी उनसे मुहब्बत कर, और जो इनसे मुहब्बत करे उससे भी मुहब्बत कर। हजरत इब्ने उमर से रिवायत है कि रसूले करीम ने फरमाया हसन और हुसैन यह दोनों दुनिया मैं मेरे दो फूल है। एक और हदीस में आया है कि नबीए करीम से पूछा गया कि अहले बैत मंे आपको सबसे ज्यादा कौन प्यारा है? तो आपने फरमाया हसन और हुसैन। और हुजूर नबीए करीम ने हजरत फातिमा से फरमाते थे कि मेरे पास बच्चों को बुलाओ। फिर उन्हें सूंघते थे और अपने कलेजे से लगाते थें। एक हदीस ...

इमाम हुसैन के कुर्बानी की तारीख

चित्र
हजरत इमाम हंुसैन 3 जिलहिज्जा सन् 60 हिजरी को अपने अहले बैत मवाली व खुद्दाम को हमराह ले कर मक्का शरीफ से इराक कीतरफ रवाना हो गए। सन् 61 हिजरी मुताबिक सन् 681 ई0का आगाज हो चुका था।मोहर्रम सन् 61 हिजरी 2 तारीख बरोज जुमेरात मुताबिक 20 अक्टूबर के दिन करबला पहुंचे।सातवीं मोहर्रम से जालिमों ने पानी बंद कर दिया।नहरे फुरात पर 500 फौजियों को लगा दियागय तााकि इमाम हुसैन का काफिला पानी न पी सकें। 9 मुहर्रमुल-हराम सन्61 हिजरी जुमेरात शाम के वक्त इब्न-साद ने अपने साथियों को इमाम हुसैन के कााफिले पर हमला करने का हुक्म दिया। आशूरह मुहर्रम की रात खत्म हुई और दसवीं मुहर्रम सन् 61 हिजरी मुताबिक 28 अक्टूबर सन् 681 ई0 की कयामत नुमा सुबह नमूदार हुई। इमाम हुसैन के अहले बैत व जांनिसार एक-एक कर शहीद हो गए आखिर में हजरत इमाम हुसैन अपने खेमे में तशरीफ लाये। सन्दूक खोला। कुबाए मिस्री जेबे तन फरमाई। अपने नाना जाना पैगम्बर साहब का अमामए मुबारक सर पर बांधा। सैयदुश्शुहदा हजरत अमीर हमजा रजियल्लाहु अन्हु की ढाल पुश्त पर रखी। शेरे खुदा हजरत सैयदुना अली की तलवार जुलफिकार गले हमाइल की और हजरत जाफर तय्यारका नेजा हाथ में ल...

करबला जाने वाले अहले बैत

चित्र
हजरत इमाम हुसैन के साथ मक्का शरीफ से इराक की जानिब सफर करने वालों मंे आपके तीन पुत्र शामिल थें। हजरत अली औसत जिनको इमाम जैनुल आबिदीन कहते है। इनकी माता हजरत शहरबानों थी।उस वक्त आपकी उम्र 22 साल थी और बीमार थे। आपके दूसरे पुत्र हजरत अली अकबर थें जो याला बिन्ते अबी मुर्रह के शिकम से थे। उनकी उम्र 18 वर्ष थी। यह करबला में शहीद हुए। आपके तीसरे पुत्र हजरत अली असगर थे। उनकी माता रूबाब बिन्त इमरउल -कैस बनी कुजाआ से थी। आप शीर-ख्वार बच्चे थे। आपकी एक बहन हजरत सकीना भी करबला में हजरत इमाम आली मकाम के हमराह थीं। उस वक्त उनकी उम्र 7 साल की थी। हजरत इमाम हुसैन की दो बीवियां आपके पास थी। एक शहरबानो और दूसरी हजरत अली असगर की वालिदा रूबाब बिन्त इमरउल-कैस। हजरत इमाम हुसैन के चार नौजवान फर्जन्द हजरत कासिम (19), हजरत अब्दुल्लाह, हजरत उमर, हजरत अबुब्रक। हजरत इमाम आली मकाम के हमराह थे और करबला में शहीद हुए। हजरत अली के पांच फर्जन्द , हजरत अब्बास, उस्मान, अब्दुल्लाह, मुहम्मद इब्ने अली, हजरत जाफ़र बिन अली हजरत इमाम के हमराह थे और सब के सब करबला में शहादत पाई। हजरत अकील के फर्जन्दों में हजरत इमाम मुस्लिम त...

शाही अंदाज में निकला मियां साहब का जुलूस

चित्र
मियां साहब के जुलूस का देखने उमड़ी भीड़ मियां साहब इमामबाड़ा स्टेट गोरखपुर से पांचवी मोहर्रम का शाही जुलूस अपनी पुरानी रिवायत के मुताबिक परम्परागत तरीके से अपनी पूरी शानेां शौकत के साथ निकाला गया। सुबह से सड़कें पर नजर टिकी हुई थी। इंतजार हो रहा था फौज का। सफेद लिबास, खाकी वर्दी, घुड़सवार और सभी के हाथों में फौजियों वाले भाले, बंदूकें, बीच में लकदक सफेद लिबास मंे चल रहे मियां साहब जैसे ही दिखे.....शोर उठा मियां साहब आ गए। अहिस्ता अहिस्ता कदम बढ़ा रहे मियां साहब को देखने क लिए भीड़ बेताब हो उठी। जुलूस गुजरा तो लोग पीछे पीछे चलने लगे। एक कारवां चल पड़ा जो कि फिर इमामबाड़ा में ही पहंुच कर समाप्त हुआ। बीते तीन सौ साल से निकल रहे मियां साहब का पांचवी का जुलूस पश्चिमी फाटक से सुबह 9 बजे निकला। जुलूस कमाल शाह की मजार पर फाातिहा पढ़ने के बाद जुलूस बक्शीपुर की ओर मुडा़। जुलूस के सबसे आगे इमामबाड़ा स्टेट का परचम और उनके पीछे सफेद और आसमानी वर्दी में अंगरक्षक चल रहे थे। मियंा साहब के निजी सुरक्षा गार्ड उनके पीछे थे। कई अदद बैण्ड वादक और शहनाई वादक भी जुलूस में शमिल थें। पांचवी मोर्हरम का जु...

हर सिम्त गंूजी सदाए हुसैन

चित्र
जिस्म से लहू टपक रहा था पर किसे फिक्र थी...। जुबां पर एक ही लफ्ज या हुसैन या हुसैन या हुसैन। सदा जैसे-जैसे बुलंद हो रही थी। जंजीर और कमा छोटा चाकू उतनी ही तेजी से जिस्म पर गिर रहे थें। नौजवान तो थे ही छोटे भी बच्चे जुनूनी हो गए थें। यह मंजर था चैथी के मातमी जुलूस का। कर्बला के मैदान में 72 जानिसार साथियों के साथ हजरत इमाम हुसैन की शहादत के गम में रविवार को बसंतपुर से हाजी मो. मेंहदी एडवोकेट के आवास से अलम का मातमी जुलूस निकला। जुलूस में अंजुमन हुसैनिया के सदस्यों ने नौहाख्वानी और सीनाजनी की । यह जुलूस बसंतपुर, हैदर बाजार, हाल्सीगंज, उर्दू बाजार, घंटाघर, रेती चैक होते हुए इमामबाड़ा आगा साहेबान गीता प्रेस पहंुचा। इस मौके पर हाजी मो. मंेहदी एडवोकेट ने कहा कि आज से चैदह साल पहल हर जब्र नाइंसाफी व आतंकवाद के खिलाफ हुसैन ने यजीद के खिलाफ आवाज उठायी थी, और यजीद की लाखों फौजों के सामने अपने चंदसाथियों के साथ कर्बला के मैदान में जंग लड़ी और बलिदान देकर इंसानियत को जिंदा रखा। हर दौर में इमाम हुसैन की कुर्बानी का महत्व रहा है। और ताकयामत तक रहेगा। इस्लाम धर्म ही इंसाफ का नाम है। इमाम हुसैन की ...

आखिर सात दरवाजों में क्यूं बंद रहता है सोना - चांदी का ताजिया

चित्र
बुधवार से होगी जियारत मोहर्रम में सात दिन होती जियारत सात दरवाजों का खुलेगा ताला गोरखपुर। मियां साहब इमामबाड़ा एक वाहिद इमामबाड़ा है जिसके अंदर सोने और चांदी की ताजिया हैं। इसे सात दरवाजों व सात तालों में बंद रखा जाता है। इसको देखने की ललक लोगों में पूरे साल बनी रहती है। लेकिन मोहर्रम के दिनों में इमामबाड़ा की शान ही कुछ और होती है। तीन से दस मोहर्रम की दोपहर तक लोग यहां ताजिए की जियारत करने आते है। इसका एक हिस्सा पूरे साल बंद रहता है। कई दरवाजों से गुजरने के बाद मोहर्रम के दिनों में इस हिस्से तक पहुंचा जा सकता है, जहां एक बड़े कमरे में सोने चांदी के दो ताजिए रखे हुए। कुछ लोग ताजियों को बाहर लगी जाली से देखते हैं तो कुछ एक-एक करके अंदर जाते हैं। अवध के नवाब ने दिया था 5.50 किलो सोने की ताजिया। बुजुर्ग की करामत सुनकर नवाब की बेगम ने इमामबाड़े में चांदी की ताजिया स्थापित कराया जो आज भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रतीक है। मोहर्रम का चांद दिखने के बाद इमामबाड़ा स्टेट के उत्तराधिकारी सोने चांदी ताजिया वाले कमरे में चाबी लेकर पहुंचते है। दो रकात नमाज अदा करते हैं। उसके बाद सोने-...

हिंदुस्तान की पहली इको फ्रेंडली गेंहू की ताजिया हो रही तैयार

चित्र
सैकडों सालों से हो रहा निमार्ण चैथी मोहर्रम से शुरू होता है निमार्ण नौवीं को दर्शन के लिए आम मिट्टी का प्रयोग नहीं होता इसकी ताजिया की शोहरत दूर दूर तक है मन्नतें होती है पूरी आपने मोहर्रम महीने में ताजिया जरूर देखा होगा। ताजिया इमाम (इराक) स्थित रौजे का काल्पनिक चित्रण या प्रस्तुति है। लोग अपनी आस्था और हैसियत के हिसाब से ताजिया बनाते हैं और उसे कर्बला नामक स्थान पर ले जाते है। इमाम हुसैन की तुरबत जरी इमारत रौजा की शक्ल सोने, चाॅंदी, लकड़ी, बाॅस, कपड़े, कागज वगैरह से बनाते हैं। मियां साहब इमामबाड़े में रखे सोने-चांदी, लकड़ी की ताजिया की शोहरत दूर दूर तक फैली है। अकीदतमंद के लिय मोहर्रम में दर्शन आम होता है। लेकिन शहर में एक ऐसी भी ताजिया है जो इको फ्रैंडली (पर्यावरण के काफी करीब) है। जिसको देखकर प्राकृतिक लगाव हो जाता है। जिसे हर खासों आम में गेहूं की ताजिया के नाम से जाना जाता है। जो एक बार देखता है तो देखता ही रह जाता है। कल यानी रविवार से इस ताजिया का निर्माण शुरू हो जायेगा। फाइल फोटो यकीन जानिए इस तरह की ताजिया पूरे हिंदोस्तान में कहीं नहीं बनती। जी हां हम बात कर रहे है पूर्व...

इमाम हसन व हुसैन जन्नती जवानों के सरदार: अख्तर

चित्र
गोरखपुर मस्जिद गौजी रौजा में चल रहे जिक्रे शोहदाए करबला की मजलिस में मदरसा दारूल हुसैनिया दीवान बाजार के मुफ्ती मौलान अख्तर हुसैन ने कहा कि इमाम हसन व इमाम हुसैन के बारे में हदीस में आया है कि हजरत अबू सईद खुदरी से रिवायत है कि पैगम्बर साहब ने फरमाया हसन और हुसैन जन्नती जवानों के सरदार है। हजरत उसामा बिन जैद फरमाते है कि एक रात में किसी काम से पैगम्बर साहब की खिदमत मंे हाजिर हुआ। तो नबी इस तरह बाहर लाये कि आप किसी चीज को उठाए हुए थे जिसे मैं न जान सका। जब मैं अर्जें हाजत से फारिग हुआ तो दर्याफ्त किया हुजूर यह क्या उठाए हुए है। आपने चादर उठाई तो मैंने देखा कि आपके दोनों पहलुओं में हजरत इमाम हसन और हुसैन है। आपने फरमाया यह दोनों मेरे बेटे और मेरे नवासे है। ऐ अल्लाह! मैं उन दोनों से मुहब्बत करता हंू तू भी उनसे मुहब्बत कर, और जो इनसे मुहब्बत करे उससे भी मुहब्बत कर। मस्जिद के पेश इमाम हाफीज रेयाज अहमद ने कहा कि हजरत इब्ने उमर से रिवायत है कि रसूले करीम ने फरमाया हसन और हुसैन यह दोनों दुनिया मैं मेरे दो फूल है। एक और हदीस में आया है कि नबीए करीम से पूछा गया कि अहले बैत मंे आपको सबसे ज्याद...

अबू रिहान अल-बेरूनी (973 ई. - 1048 ई.)

अल-बेरूनी का पूरा अबू रिहान मुहम्मद बिन अहम अल-बेरूनी है। उनका जन्म ईरान के नगर खवारजम के निकट एक गांव मंे हुआ। वह महान खगोल शास्त्री गुजरे हैं। उन्हें अपने जीवन में ही कीर्ति प्राप्त हुई। उस समय खवारजम पर अहमद बिन मुहम्मद बिन इराकी का शासन था। इस परिवार का संबंध राक से था इसलिए वह आल-ए-ईराक (ईराक के वंशज) कहलाते थे। अल-बेरूनी का चचेरा भाई ज्ञान और विद्या का पारखी था। इसलिए उसने अल-बेरूनी की शिक्षा और प्रशिक्षण का पूरा प्रबंध किया। यही कारण है कि अल-बेरूनी ने अपनी पुस्तकों में अपने चचेरे भाई का विवरण बड़े सम्मान के साथ किया है। जब खवारजमी का राज्य समाप्त हुआ तो अल बेरूनी पलायन करके जरजान चले आए। वहां के शासक काबूस ने आपका बड़ा सम्मान किया और अल बेरूनी कई वर्ष जरजान में रहे। यहां अल-बेरूनी ने अपनी प्रथम पुस्तक’ आसारूल वाक्रिया’ लिखी। जब खवारजम में स्थिति सामान्य हो गई तो वह वतन वापस आ गए। उस जमाने में महान वैज्ञानिक और आयुर्विज्ञान शास्त्री बू-अली सीना खवारजम आए हुए थे। दोनों महान व्यक्तियों की मुलाकात हुई और दोनों ने घण्टों विभिन्न विषयों पर विचार-विमर्श किया। उसके बाद अल-बेरूनी अफगान...

डेढ़ सेमी का दरूद शरीफ

चित्र
राज कुमार की सूक्ष्म कृतियां नायाब गोरखपुर। पिछले साल सैफई महोत्सव में गोरखपुर के एक हुनरमंद ने यूपी के सीएम अखिलेश यादव को अपनी कला से सम्मोहित कर लिया। दाल के दाने पर सीएम की तस्वीर बना डाली। सीएम वाह क्या बात कहने पर मजबूर हो गए। सीएम इस कदर खुश हुए कि पीए को आदेश दिया कि इस हुनरमंद का विजिटिंग कार्ड रख लो। गोरखपुर के लाल को पन्द्रह हजार रूपए माहवार मिलेगा। हुनर के धनी इस शख्स का नाम है राज कुमार वर्मा। बसंतपुर में इनकी रिाईशगाह है। एक अगस्त 1951 को किशुन लाल वर्मा के घर में जन्में राज कुमार की ख्याति की ख्याति पूरे देश में है। राज्य सरकार द्वारा 1992 में पुरस्कार पा चुके है। 1992 में ही अयोध्या में स्वण पदक से नवाजा जा चुका है। इसके अलावा ढे़र सारे पुरस्कार। बेंगलुरू, कर्नाटक, हरियाणा, उत्तरांचल, ताज महोत्सव आगरा, नई दिल्ली, सीमांत बिहार राज्य,, सूरजकुंड हरियाणा, मेरठ, लखनऊ सहित देश के अन्य हिस्सों मंे अपनी कला का लोहा मनवा चुके है। वर्मा के पिता पेशे से घड़ीसाज व पहलवान थे। वह चाहते थे कि उनका पुत्र भी नामी पहलवान बने। लेकिन राज कुमार तो कला के प्रेमी थे। उन्हें तो अपने हुनर की ...

दादरी में मरहूम एखलाक का कत्ल लोकतंत्र पर काला दाग

गोरखपुर। रसूलपुर स्थित पूर्व पार्षद नबीउल्लाह अंसारी के घर मोमिन अंसार काउंसिल की बैठक हुई। अध्यक्षता काउंसिल के जिलाध्यक्ष वसीम अंसारी ने व संचालन जिला उपाध्यक्ष इम्तेयाज अंसारी ने की। जिलाध्यक्ष ने कहा कि एखलाक का कत्ल भारत के लोकतंत्र पर काला दाग है। इस तरह की वारदातों से गंगा-जमुनी तहजीब खत्म हो जायेगी। उन्होंने मांग किया कि केंद्र व राज्य सरकार दंगाईयो पर कड़ी कार्यावाही करें और एखलाक के हत्यारों को तत्काल फांसी की सजा दी जायें। जिला उपाध्यक्ष ने कहा कि एखलाक के परिजनों को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पचास लाख रूपया आर्थिक मदद दी जाएं ताकि पीडि़त परिवार को न्याय मिल सके। पूर्व पार्षद नबीउल्लाह ने कहा कि उप्र सरकार के चलर कानून व्यवस्था पर सवाल उठाया और सरकार से अपील किया कि भविष्य मंे इस तरह की अमानवीय घटना दोबार ना होने पाएं। इस दौरान शमशाद अंसारी, मंसूर अंसारी, सेराज अंसारी, कामरेट जियाउद्दीन सदरे आलम असंारी, अरशद, एहतेशाम अंसारी, अजहर अली सहित तमाम लोग मौजूद रहे।