गोरखपुर : अंग्रेजों के ज़माने में 81 साल पहले शहर में कायम हुआ लड़कियों का पहला मदरसा वर्नाक्यूलर
गोरखपुर : अंग्रेजों के ज़माने में 81 साल पहले शहर में कायम हुआ लड़कियों का पहला मदरसा वर्नाक्यूलर
-हैदरी बेगम ने 84 साल पहले मियां साहब इमामबाड़े में लड़कियों के लिए जलायी इल्म की शम्मा
- मदरसा आज इमामबाड़ा मुस्लिम गर्ल्स इंटर कॉलेज के रुप में वृहद शक्ल अख्तियार कर चुका है
- इमामबाड़े से ही जुड़ा है सैय्यद जव्वाद अली शाह इमामबाड़ा गर्ल्स डिग्री कॉलेज
गोरखपुर। सुन्नी संप्रदाय का एक वाहिद इमामबाड़ा जनपद के मशहूर मोहल्ला मियां बाजार में स्थित है। जिसकी उम्र कई सौ साल की हो चुकी हैं। मुहर्रम के दस दिनों में इसकी रौनक देखते ही बनती है। शहर में हिन्दू-मुस्लिम एकता का यह मरकज है। इसकी ख्याति हजरत रोशन अली शाह, इमामबाड़े की इमारत, ऐतिहासिक धूनी, सोने चांदी ताजिया व यहां से निकलने वाले ऐतिहासिक जुलूसों के रुप में दूर तलक हैं। लेकिन इस इमामबाड़े के आगोश में 84 साल पहले का एक ऐसा तारीखी वाकया भी बावस्ता हैं जिसने लड़कियों खास कर मुस्लिम लड़कियों की शिक्षा के क्षेत्र में अहम किरदार निभाया। 81 साल पहले अंग्रेजों के जमाने में इमामबाड़ा में लड़कियों का पहला मदरसा कायम हुआ। आज यह मदरसा इंटर व डिग्री कालेज का रुप अख्तियार कर चुका हैं।
आज यहां से निकली लड़कियां बेहतरीन बेटी, पत्नी, मां सहित तमाम किरदार को बाखूबी अंज़ाम देती नज़र आ रही हैं। यहां शिक्षा ही नहीं हासिल कर रही हैं बल्कि ज़िंदगी जीने का सलीका व करीना भी सीख रही हैं। इन सब कामयाबी के पीछे जिस हस्ती का नाम हैं उन्हें तारीख़ हैदरी बेगम के नाम से जानती और पहचानती है। जिनकी एक रौशन सोच ने लड़कियों के मुस्तकबिल की शम्मा रौशन कर दी। मुस्लिम कौम तो उनकी बेहद शुक्रगुजार है। इस इल्म की रौशनी को इमामबाड़े तक पहुंचने में 140 साल लग गये। इमामबाड़ा तामीर के 140 सालों बाद इमामबाड़ा महिलाओं के इल्म का रौशन मरकज बना।
वाक्या यूं है कि इमामबाड़े के पूर्व मुतवल्ली मजहर अली शाह ने 1997 में एक साक्षात्कार के दौरान बताया था कि उनकी वालिदा हैदरी बेगम के अब्बा यूसुफ अली थे। वह लखनऊ के गोलागंज में रहते थे। हैदरी बेगम की तालीम हार्वर्ड कॉलेज लखनऊ में हुई थी । शादी हुई तो हैदरी बेगम गोरखपुर आ गईं। उन्होंने इमामबाड़े को देखने के बाद सन् 1933 में इस इमारत को लड़कियों के इल्म के लिये इस्तेमाल करने का प्रस्ताव पेश किया। जिसके बाद मेरे वालिद जव्वाद अली शाह ने सन् 1936 में इस शहर में लड़कियों के लिए पहले मदरसे की स्थापना की। जिसका नाम वर्नाक्यूलर स्कूल रखा गया । यही स्कूल 1948 में इमामबाड़ा हाई स्कूल और 1956 में इंटर कॉलेज बन गया। इसी इमामबाड़े के बाहरी हिस्से में बाद में सन् 1973 में सैय्यद जव्वाद अली शाह इमामबाड़ा गर्ल्स डिग्री कॉलेज स्थापित हुआ। आज भी इल्म की शम्मा रौशन किए हुए है।
इमामबाड़े के कुछ हिस्सों को छोड़कर बाकी हिस्से में शिक्षण कार्य होता है। यह इमामबाड़ा लखनऊ के बडे़ इमामबाड़े का समकालीन है। अभिलेखों के मुताबिक सूफी बुजुर्ग रौशन अली शाह की इच्छा पर नवाब आसिफुद्दौला ने इमामबाड़ा बनवाने का काम शुरू कराया जो सन् 1796 में यह इमामबाड़ा रोशन अली शाह के हवाले किया गया। नवाब ने 17 गांव भी इमामबाड़े को वक्फ में दिए। इस्लामी फने तामीर में मस्जिदों और मकबरों के बाद सबसे महत्वपूर्ण स्थान इमामबाड़ो का है अन्य इमामबाड़ों की तरह इसके तीन हिस्से हैं। पहले हिस्से को शहनशीं कहते हैं, जहां ताजिया रखे जाते हैं। इसके चारों ओर दालान है, जहां मजलिसों का आयोजन होता है। इस इमामबाडे़ के निर्माण में स्थानीय प्रभाव भी झलकता है। दिल्ली के इमामबाड़ों में पत्थरों पर नक्काशी दिखती है, गोरखपुर में लकड़ी का बेहतरीन काम हुआ है। इमामबाड़ा इस्टेट के गद्दीनशीन अहमद अली शाह पहले मियां साहब हुए। सन् 1874 में उनके इंतकाल के बाद मरहूम वाजिद अली शाह उत्तराधिकारी हुए, जिनके समय में इमामबाडे़ का काफी विकास हुआ। आज इमामबाड़ा कई उत्तरदायित्व निभा रहा है। जिसमें साल भर शिक्षा, मुहर्रम में मरसिया, मजलिस, जुलूस, गरीबों में खिचडे़ की तकसीम, कई मदरसों और मसजिदों को सहायता देना शामिल हैं। वर्तमान में अदनान फर्रुख अली शाह पांचवें मियां साहब हैं।
इमामबाड़े के कुछ हिस्सों को छोड़कर बाकी हिस्से में शिक्षण कार्य होता है। यह इमामबाड़ा लखनऊ के बडे़ इमामबाड़े का समकालीन है। अभिलेखों के मुताबिक सूफी बुजुर्ग रौशन अली शाह की इच्छा पर नवाब आसिफुद्दौला ने इमामबाड़ा बनवाने का काम शुरू कराया जो सन् 1796 में यह इमामबाड़ा रोशन अली शाह के हवाले किया गया। नवाब ने 17 गांव भी इमामबाड़े को वक्फ में दिए। इस्लामी फने तामीर में मस्जिदों और मकबरों के बाद सबसे महत्वपूर्ण स्थान इमामबाड़ो का है अन्य इमामबाड़ों की तरह इसके तीन हिस्से हैं। पहले हिस्से को शहनशीं कहते हैं, जहां ताजिया रखे जाते हैं। इसके चारों ओर दालान है, जहां मजलिसों का आयोजन होता है। इस इमामबाडे़ के निर्माण में स्थानीय प्रभाव भी झलकता है। दिल्ली के इमामबाड़ों में पत्थरों पर नक्काशी दिखती है, गोरखपुर में लकड़ी का बेहतरीन काम हुआ है। इमामबाड़ा इस्टेट के गद्दीनशीन अहमद अली शाह पहले मियां साहब हुए। सन् 1874 में उनके इंतकाल के बाद मरहूम वाजिद अली शाह उत्तराधिकारी हुए, जिनके समय में इमामबाडे़ का काफी विकास हुआ। आज इमामबाड़ा कई उत्तरदायित्व निभा रहा है। जिसमें साल भर शिक्षा, मुहर्रम में मरसिया, मजलिस, जुलूस, गरीबों में खिचडे़ की तकसीम, कई मदरसों और मसजिदों को सहायता देना शामिल हैं। वर्तमान में अदनान फर्रुख अली शाह पांचवें मियां साहब हैं।

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