पैगम्बर मुहम्मद साहब मोहसिने इंसानियत

12 रबीउल अव्वल पर खास गोरखपुर। आपकी याद को कैसे न जिदंगी समझंू। यहीं तो एक सहारा है जिदंगी के लिए। मेरे तो आप ही सब कुछ है रहमतें आलम। मैं जी रहा हूं जमाने में आप ही के लिए।। गोेरखपुर। जब-जब दुनिया में बुराईयां बढ़ती है तब खुदा नबी व रसूल भेजता है। पैगम्बर हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने ऐसे जमाने में जन्म लिया। जब अरब के हालात बेहद खराब थे। बच्चियों को जिंदा दफन कर दिया जाता था। विधवाओं से बुरा सुलूक होता था। छोटी-छोटी बात पर तलवारें खींच जाती, खून की नदियां बह जाती थीं। अरब कबीलों में बटा थां इंसानियत शर्मसार हो रही थी। ऐसे समय में इंसानों की रहनुमाई के लिए इस्लामिक तारीख 12 रबीउल अव्वल यानी 20 अप्रैल सन् 571 ई. में अरब के मक्का शहर में हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम का जन्म हुआ। पिता का नाम हजरत अब्दुल्लाह, मां का नाम हजरत आमीना दादा हजरत अब्दुल मुत्तलिब थे। बचपन में पिता का साया उठ गया। आपके दादा ने परवरिश की। आपने हमेशा अपने किरदार, गुफ्तार से इंसान को शिक्षा दी कि सभी मानव समान है एक अल्लाह की संतान हैं। आपकी तालीमात से मक्का में रहने वालों को काफी परेशानी होने लगी। आपको तरह-तरह की तकलीफें दी गयी। जिसका आपने हंस कर सामना किया। चालीस साल की उम्र में आपने एैलाने नुबूवत किया। आपको मक्का से हिजरत करने पर मजबूर किया गया। आपने मदीना शरीफ में ठहराव पसंद किया। इतनी परेशानियों के बाद आपने मिशन को नहीं छोड़ा और खुदा के पैगाम को पूरी दुनिया में पहुंचाया। आपने मजलूमांे, गुलामों, औरतों, बेसहारा, यतीमों को उनका हक दिलाया। आपकी तालीमात पर अमल करके दीन व दुनिया में कामयाबी पायी जा सकती है। इस्लाम के नाम पर दहशतगर्दी फैलानेें वालों ने हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की जिदंगी का सही से मुताअला नहीं किया। आपके जमाने में जितनी भी जंगे लड़ी गयी। वह सब बचाव में थी। उसमें करीब 1000 लोग मारे गये। आपने हर धर्म के मानने वालों के साथ रहमदिली का सुलूक किया। साहाबा, तबे ताबईन, औलिया, उलेमा ने आपके नक्शेकदम पर चलकर इंसानों को हक की राह दिखायी। आप 63 साल की उम्र में 12 रबीउल अव्वल सन् 11 हिजरी के मुताबिक 8 जून 632 ई. को फानी दुनिया से पर्दा फरमायें। आपकी मजार-ए-मुबारक मदीना शरीफ में हैं जहां पर आशिके रसूल जियारत कर फैजयाब होते हैं। सरकार के कदमों के निशा ढ़ूढ रहा हंू। जो अश्क तेरी आखों की पुतली से गिरा हैं। यादे नबी-ए-पाक में रोए जो उम्र भर। मौला मुझे तलाश ऐसे चश्मेंतर की है। शहर के उलेमा बोले- गौसिया जामा मस्जिद छोटे काजीपुर के इमाम मौलाना मोहम्मद अहमद ने कहा कि ईद मिलादुन्नबी की महफिल सजाना नबी से मुहब्बत की दलील है और शरीयत की नजर में महबूब भी है। हमारे बुजुर्गों से इसका साक्ष्य भी मिलता है। शेख इमाम इब्ने जूजी ने अलमिलादुन्नबवी पेज 58 पर लिखा है कि तमाम अहले अरब, मिस्र, यमन और शाम के तमाम मुल्कों में अकीदत और नबी से मुहब्बत के इजहार के तौर पर हमेशा मनाते रहे है। जामिया रजा-ए-मुस्तफा के मौलाना अजहर शम्सी कहा कि जश्न-ए-ईदमिलादुन्नबी का ऐहतमाम करें। अच्छे कपड़े पहने, खुशबू लगाये, महफिलें मीलाद में शिरकत करें। जब हजरत आदम अलैहिस्सलाम की तखलीक हुई तो हर जुमा ईद हो गयी। तो जो आदम का भी नबी है, उसके पैदा होने पर तो पूरे साल खुशियां मनानी चाहिए। मकबरे वाली मस्जिद बनकटी चक मस्जिद के इमाम नेमतुल्लाह ने कहा कि यह त्यौहार हमारे लिए खास है। इस दिन इंसानों के रहनुमा भेजे गये। इसलिए खुदा ने हमें बेहतरीन उम्मत के खिताब से नवाजा। हमें चाहिए की हम उनकी बतायी तालीम पर अमल करें। मदरसा दारूल उलूम हुसैनिया दीवान बाजार के मुफ्ती अख्तर हुसैन ने कहा कि यह पर्व ईदों की ईद है। पैगम्बर साहब ने इंसानों को जीने का तरीका बताया। लोगों को सही रास्तें पर चलने की तालीम दी। मोमिन अंसार सभा के जिलाध्यक्ष वसीम अंसारी ने कहा कि मुसलमानों को इस मौके पर नेक काम करें। सभी को ऐहतेराम करें। महफिलंे मीलाद, कुरआन ख्वानी, नात ख्वानी करें गरीबों, यतीमों को खाना खिलाएं। जुलूस-ए-मुहम्मदी में जरूर शामिल हों। हाफीज अयाज ने कहा कि ईद मिलादुन्नबी ना होती तो ईद व ईदुल अज्हा की खुशी न मिलती। इस दिन हमें वह हर नेक काम करना चाहिए। जिसमें हमारे नबी खुश हो और हर उस काम से रूकें जिससे नबी नाखुश हों। मदरसा हुसैनिया दीवान बाजार मंे सहायक अध्यापक मोहम्मद आजम ने कहा कि हमें नबी की जिदंगी से यह तालीम मिलती है कि लोगों के साथ भलाई करंें। सभी एक अल्लाह के बंदे है। सभी के साथ समानता का व्यवहार करें। हाजी उबैद खान, हाफीज रहमत अली, अधिवक्ता खुर्शीद अहमद, नवेद आलम, मोहम्मद नदीम ने कहा कि सारी दुनिया पैगम्बर मुहम्मद साहब के तुफैल बनायी गयी। आप सारी दुनिया के लिए रहमत है। लोगों को भलाई का पैगाम देने वाले है। कुछ लोग मुसलमान होने का दावा कर दहशतगर्दी फैला रहे है। यह इस्लाम के नाम को बदनाम कर रहें है। इस्लाम का इन सब से कोई वास्ता नहीं। मुहम्मद साहब ने ईसाईयों, यहूदियों सहित तमाम मजहबों वालों के साथ बेहतरीन सुलूक किया। उसी का नतीजा है कि आज दुनिया में इस्लाम का बोल बाला है।

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