संदेश

सितंबर, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ईदुल अजहा की नमाज का तरीका

चित्र
नियत की मैंने दो रकात नमाज ईदुल अजहा वाजिब मय जायद छः तकबीरों के वास्ते अल्लाह तआला के मुहं मेरा काबा शरीफ की तरफ पीछे इस इमाम के अल्लाहु अकबर कह कर हाथ बांध ले और सना पढ़ें। दूसरी और तीसरी मरर्तबा अल्लाहु अकबर कहता हुआ हाथ कानों तक ले जायें फिर छोड़ दे। चैथी मर्तबा तकबीर कहकर हाथ कानों तक ले जायें फिर बांध लें। अब इमाम के साथ रकात पूरी करे। दूसरी रकात में कीरत के बाद तीन मर्तबा तकबीर कहता हुआ हाथ कानों तक ले जायें और हाथ छोड़ दे चैथी मर्तबा बगैर हाथ उठायें तकबीर कहता हुआ रूकूअ में जाये और नमाज पूरी कर लें, बाद नमाज इमाम खुत्बा पढ़े और जुम्ला हाजिरीन खामोशी के साथ सुने खुत्बा सुनना वाजिब है। जिन मुकतादियों तक आवाज न पहंचती हो उन्हंे भी चुप रहना वाजिब है बाद दुआ मांगे फिर बाद दुआ इजहारे मर्शरत के लिए मुसाफा व मुआनका करना बेहतर है।

तकबीरे तशरीक

चित्र
नवीं जिलहिज्जा के फज्र की नमाज से तेरहवीं के असर तक हर फर्ज नमाज के बाद जो जमात से अदा की गई तो एक मरतबा तकबीरे तश्रीक ‘‘ अल्लाहु अकबर अल्लाहु अकबर ला इलाहा इल्लल्लाह वल्लाहु अकबर अल्लाहु अकबर व लिल्लाहिल हम्द’ बुलंद आवाज से कहना वाजिब है और तीन बार अफजल है।

गोरखपुर में ईदुल अज्हा की नमाज का वक्त

चित्र
कादरिया मस्जिद नखास चैक प्रातः 6.30 बजे गाजी मस्जिद गाजी रौजा, प्रातः 7.30 बजे ईदगाह सेहरा बाले का मैदान, प्रातः 9ः00 बजे ईदगाह मुबारक खां शहीद, प्रातः 8ः00 बजे ईदगाह बेनीगंज, प्रातः 9ः00 बजे ईदगाह इमामाबाड़ा स्टेट, प्रातः 8ः00 बजे ईदगाह चिलमापुर, प्रातः 7ः30 बजे ईदगाह पुलिस लाइन, प्रातः 8ः30 बजे शाही जामा मस्जिद उर्दू बाजार, प्रात 8ः30 बजे जामा मस्जिद पुराना गोरखपुर, प्रातः 8ः00 बजे जामा मस्जिद रसूलपुर, प्रातः 8ः30 बजे

गोरखपुर में लगने वाली मार्केट

चित्र
जामा मस्जिद उर्दू बाजार, शाहमारूफ, खूनीपुर, जबहखाना, रेती रोड, मदीना मस्जिद, तुर्कमानपुर, चक्सा हुसैन पाकीजा होटल खुनीपूर, अस्करगंज, जाफराबाजार, रसूलपूर, इलाहीबाग, गोरखनाथ, दीवान बाजार, गाजीरौजा ऊंचवा में जानवरों की मार्केट लगती है। इसके अलावा दूरदराज के गांवों से लोग जानवर बेचने के लिये आते है।

कुर्बानी के जानवारों की आवक

चित्र
कुर्बानी के जानवर की आवक बढ़ी है। 25 सितम्बर को ईदुल अज्हा है। व्यवसाायियों द्वारा कुर्बानी का जानवर विभिन्न जगहों पर लगने वाली मार्केट से आवक किया गया। खलीलाबाद सोमवार को बहराइच रविवार को बाराबंकी शनिवार को चैरीचैरा शानिवार को फैजाबाद गुरूवार को कालपी मंगलवार को अल्लाहपुर गुरूवार को फतेहपुर सिकरी गुरूवार को हुजूरपुर गुरूवार को सहित आसपासके जिलों से आवक हो रही है।

जानवरों में शिरकत

चित्र
भेड़, बकरी, दुम्बा सिर्फ एक आदमी की तरफ से एक जानवर होना चाहिए और भैंस, ऊंट में सात आदमी शिरकत कर सकते है।

कुर्बानी का वक्त

चित्र
जिलज्जिा की 10,11,12 तारीख कुर्बानी के लिए मख्सूस दिन है। मगर पहला दिन अफजल है। देहात में 10 जिलहिज्जा की तुलू फज्र के बाद ही से कुर्बानी हो सकती है मगर बेहतर यह है कि तुलू आफताब के बाद कुर्बानी की जाये। शहर मं नमाजें ईद से पहले कुर्बानी नहीं हो सकती। कुर्बानी दिन में करनी चाहिए। दरमियानी रातों में जिब्ह करना मकरूह है।

तकसीमे गोश्त व खाल

चित्र
कुर्बानी का गोश्त काफिर को न दिया जायंे। चर्म कुर्बानी या गोश्त वगैरह जिब्ह करने वाले को बतैार उजरत देना जायज नहीं। बेहतर यह है कि कुर्बानी के गोश्त के तीन हिस्से कर लें। एक हिस्सा फुकरा और मशाकीन , एक हिस्सा दोस्त व अहबाब और एक अपने अहलो अयाल के लिए रख छोड़े। अगर घर के लोग ज्यादा हो तो सब गोश्त रख सकते है और सदका भी कर सकते है। और बेहतर बांटना ही है। अगर जानवर में कई लोग शरीक हो तो सारा गोश्त तौल कर तक्सीम किया जाये। अंदाज से नहीं। अगर किसी को ज्यादा गोश्त चला गया तो माफ करने से भी माफ नहीं होगा। कुर्बानी की खाल सदका कर दें या किसी दीनी मदरसें को दे।

मुस्ताहाबात

चित्र
जिसके जिम्मे कुर्बानी है उसके लिए बेहतर है कि चांदरात से बाल न बनवायें न नाखून तरशवायें, दसवीं जिलहिज्जा को नमाज से पहले कुछ न खायें, साफ सुथरे या नये कपड़े हसबे इसतात पहने खुश्बू लगाये, ईदगाह को तक्बीरे तशरीक बाआवाजें बंुलंद कहता हुआ एक रास्ते से जायें और दूसरे रास्ते से वापस आयें।

कुर्बानी करने का तरीका

चित्र
जानवर को बायें पहलू पर इस तरह लिटाये कि किब्ला को उसका मुहं हो और अपना दाहिना पांव उसके पहलू पर रख कर जल्द जिब्ह करें। अलबत्ता जिब्ह से पहले यह दुआ पढें- ‘‘ इन्नी वज्जहतु वजहिय लिल्लजी फ़तरस्समावाति वल अरज़ हनीफव व मा अना मिनल मुशारिकीन. इन्न सलाती व नुसुकी व महयाय व ममाती लिल्लाहि रब्बिल आलमीन लाशरीक लहु व बिजालि क उमिरतु व अना मिनल मुस्लिम अल्लाहुम्म मिन क व ल क’’ फिर ‘‘बिस्मिल्लाहि अल्लाहु अकबर’’ पढ. कर जब्ह करे फिर यह दुआ पढे. ‘‘ अल्लाहुम्म तक़ब्बल मिन्नी कमा तक़ब्बल त मिन खलीलि क इब्राहीम अलैहिस्सलाम व हबीबि क मुहम्मदिन सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम’’ अगर कुर्बानी अपनी तरफ से हो तो ‘‘मिन्नी’’ और अगर दूसरों की तरफ से हो तो ‘‘मिन्नी’’ के बजाए ‘‘मिन’’ कह कर उसका नाम लें। और अगर बड़े जानवर भैंस वगैरह की कुर्बानी कर रहे है तो फलां की जगह सब शरीकों का नाम लें अगर दूसरे से जब्ह कराएं तो खुद भी हाजिर रहे।

कुर्बानी के मुताल्लिक जरूरी मसायल

चित्र
x गोरखपुर। मौलाना मोहम्मद अजहर शम्सी ने बताया कि जो मालिके निसाब अपने नाम से एक बार कुर्बानी कर चुका है और दूसरे साल भी वह मालिके निसाब है तो फिर इस पर अपने नाम से कुर्बानी वाजिब है। (अनवारूल हदीस) बाज लोग यह ख्याल करते हैं अपनी तरफ से जिदंगी में सिर्फ एक बार कुर्बानी वािजब है यह शरअन गलत है और बेबुनियाद है इसलिए कि मालिके निसाब पर हर साल अपने नाम से कुर्बानी वाजिब है। (फतावा फैजे रसूल) देहात में दसवीं जिलहिज्जा को सुबह सादिक के बाद ही से कुर्बानी करना जायज है लेकिन मुस्तहब यह है कि सूरज तुलू होने के बाद करें। (फतावा आलमगीरी) रात में कुर्बानी करना मकरूह है। (फतावा फैजे रसूल) शहर के आदमी को कुर्बानी का जानवर देहात में भेज कर नमाज ईद से पहले कुर्बानी करा कर गोश्त को शहर में मंगवा लेना जायज है। (बहारे शरीयत) कुर्बानी का चमड़ा या गोश्त या इसमें से कोई चीज जब्ह करने वाले कसाब को मेहनताने के तौर पर देना जायज नहीं। (फतावा रजविया) शहर में नमाजे ईदुल अज्हा से पहले कुर्बानी करना जायज नहीं है। (बहारे शरीयत)

कुर्बानी का जानवर

चित्र
कुर्बानी के जानवर की उम्र महत्वपूर्ण होती है। ऊंट पांच साल, भंैस दो साल, बकरी व खशी एक साल । इससे कम उम्र होने की सूरत में कुर्बानी जायज नहीं ज्यादा हो तो अफजल है। अलबत्ता दुम्बा या भेड़ छः माह का जो इतना बड़ा हो कि देखने में साल भर का मालूम हेाता हो उसकी कुर्बानी जायज है। कुर्बानी के जानवर को एैब से खाली होना चाहिए। अगर थोड़ा से एैब हो तो कुर्बानी हो जायेगी मगर मकरूह होगी और ज्यादा हो तो कुर्बानी होगी ही नहीं। अंधे जानवर की कुर्बानी जायज नहीं इतना कमजोर जिसकी हड्डियां नजर आती हो। और लगंड़ा जो कुर्बानी गाह तक अपने पांव से जा न सकें और इतना बीमार जिसकी बीमारी जाहिर हो जिसके कान या दमू तिहायी से ज्यादा कटे हो इन सब की कुर्बानी जायज नही। ऊंट और भैंस वगैरह में सात आदमी शिकरत कर सकते हैं जबकि उन सब की नियत तकरीब की हों। कुर्बानी और अकीका की शिरकत हो सकती है। जानवर को जिब्ह करने के बाद हाथ पांव कांटने से उस वक्त तक रूके रहे जबतक कि उसके तमाम आजार से रूह निकल न जायें।

कुर्बानी मालिके निसाब पर वाजिब

चित्र
इस त्योहार में हर वह मुसलमान जो आकिल बालिग मर्द औरत जिसके पास साढ़े बावन तोला चांदी या साढ़े सात तोला सोना का मालिक हो या इनमें से किसी की कीमत के सामाने तेजारत हो या तकरीबन 25 हजार रूपया हो उसके ऊपर कुर्बानी वाजिब है । कुर्बानी के लिए मुकीम होना भी जरूरी है। इसी वजह से हर मुसलमान इस दिन कुर्बानी करवाता है। जानवर जिब्ह करने के वक्त उसकी नियत होती है कि उसके अंदर की सारी बदअख्लाकी और बुराई सबकों मैने इसी कुर्बानी के साथ जिब्ह कर दिया और इसी वजह से मजहबे इस्लाम में ज्यादा से ज्यादा कुर्बानी का हुक्म किया गया है। कुर्बानी का अर्थ होता है कि जान व माल को खुदा की राह में खर्च करना। इससे अमीर, गरीब इन अय्याम में खास बराबर हो जाते है और बिरादराने इस्लाम से भी मोहब्बत का पैगाम मिलता है। कुर्बानी हमें दर्स देती है कि जिस तरह से भी हो सके अल्लाह की राह में खर्च करो। कुर्बानी से भाईचारगी बढ़ती है।

दो पैगम्बरों की कुर्बानी का अजीम पर्व ईद-उल-अजहा

चित्र
गोरखपुर। ‘‘ ऐ मुसलमां सुन ये नुक़्ता दरसे कुरआनी में है। अजमतें इस्लाम व मुस्लिम सिर्फ कुर्बानी में है।।’’ इस्लाम में कुर्बानियों की महत्वपूर्ण भूमिका है। उसी में से एक ईद-उल-अजहा है। जो एक अजीम बाप की अजीम बेटे की कुर्बानी के लिए याद किया जाता है। दुनिया के तीन सबसे बड़े मजहब इस्लाम, यहूदी, ईसाई तीनों के एक पैगम्बर जिनका नाम इब्राहीम है। उनसे मंसूब एक वाक्या इस त्यौहार की बुनियाद है। मदरसा दारूल उलूम हुसैनिया दीवान बाजार के मुफ्ती अख्तर हुसैन मन्नानी ने बताया कि यह वाक्या यह है कि खुदा के हुक्म से उन्होंने अपने बेटे हजरत इस्माइल जो बुढ़ापे के दौरान सालों की दुआओं के बाद पैदा हुये उनको खुदा की राह में कुर्बान करने से ताल्लुक रखता है। खुदा ने हजरत इब्राहीम को ख्वाब में अपनी सबसे अजीज चीज कुर्बान करने का हुक्म दिया। हजरत इब्राहीम ने अपने तमाम जानवरों को खुदा की राह में कुर्बान कर दिया। यह ख्वाब दो मर्तबा हुआ। तीसरी मर्तबा हजरत इब्राहीम समझ गये कि खुदा उनसे प्यारे लाडले की कुर्बानी का तालिब है। यह अल्लाह की अजमाइश का सबसे बड़ा इम्तिहान था। अल्लाह के हुक्म से उन्हें जिब्ह करने के लिये ...

कुर्बानी करने का तरीका

चित्र
जानवर को बायें पहलू पर इस तरह लिटाये कि किब्ला को उसका मुहं हो और अपना दाहिना पांव उसके पहलू पर रख कर जल्द जिब्ह करें। अलबत्ता जिब्ह से पहले यह दुआ पढें- ‘‘ इन्नी वज्जहतु वजहिय लिल्लजी फ़तरस्समावाति वल अरज़ हनीफव व मा अना मिनल मुशारिकीन. इन्न सलाती व नुसुकी व महयाय व ममाती लिल्लाहि रब्बिल आलमीन लाशरीक लहु व बिजालि क उमिरतु व अना मिनल मुस्लिम अल्लाहुम्म मिन क व ल क’’ फिर ‘‘बिस्मिल्लाहि अल्लाहु अकबर’’ पढ. कर जब्ह करे फिर यह दुआ पढे. ‘‘ अल्लाहुम्म तक़ब्वल मिन्नी कमा तक़ब्बल त मिन खलीलि क इब्राहीम अलैहिस्सलाम व हबीबि क मुहम्मदिन सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम’’ अगर कुर्बानी अपनी तरफ से हो तो ‘‘मिन्नी’’ और अगर दूसरों की तरफ से हो तो ‘‘मिन्नी’’ के बजाए ‘‘मिन’’ कह कर उसका नाम लें। by syed farhan --------------------

कुर्बानी का जानवर

चित्र
कुर्बानी के जानवर की उम्र महत्वपूर्ण होती है। ऊंट पांच साल, भंैस दो साल, बकरी व खशी एक साल । इससे कम उम्र होने की सूरत में कुर्बानी जायज नहीं, ज्यादा हो तो अफजल है। अलबत्ता दुम्बा या भेड़ छः माह का जो इतना बड़ा हो कि देखने में साल भर का मालूम हेाता हो उसकी कुर्बानी जायज है। कुर्बानी के जानवर को एैब से खाली होना चाहिए। अगर थोड़ा से एैब हो तो कुर्बानी हो जायेगी मगर मकरूह होगी और ज्यादा हो तो कुर्बानी होगी ही नहीं। अंधे जानवर की कुर्बानी जायज नहीं इतना कमजोर जिसकी हड्डियां नजर आती हो। और लगंड़ा जो कुर्बानी गाह तक अपने पांव से जा न सकें और इतना बीमार जिसकी बीमारी जाहिर हो जिसके कान या दूम तिहायी से ज्यादा कटे हो इन सब की कुर्बानी जायज नही। ऊंट और भैंस वगैरह में सात आदमी शिकरत कर सकते हैं जबकि उन सब की नियत तकरीब की हों। कुर्बानी और अकीका की शिरकत हो सकती है। जानवर को जिब्ह करने के बाद हाथ पांव कांटने से उस वक्त तक रूके रहे जबतक कि उसके तमाम आजार से रूह निकल न जायें। by syed farhan

अजमतें इस्लाम व मुस्लिम सिर्फ कुर्बानी में है...

चित्र
बाप-बेटे की कुर्बानी का अजीम पर्व ईद-उल-अजहा गोरखपुर। ‘‘ ऐ मुसलमां सुन ये नुक्ता दरसे कुरआनी में है। अजमतें इस्लाम व मुस्लिम सिर्फ कुर्बानी में है।।’’ मदरसा दारूल उलूम हुसैनिया दीवान बाजार के मुफ्ती मौलाना अख्तर हुसैन अजहरी मन्नानी ने बताया कि इस्लाम में कुर्बानियों की महत्वपूर्ण भूमिका है। उसी में से एक ईद-उल-अजहा है। जो एक अजीम बाप की अजीम बेटे की कुर्बानी के लिए याद किया जाता है। दुनिया के तीन सबसे बड़े मजहब इस्लाम, यहूदी, ईसाई तीनों के एक पैगम्बर जिनका नाम हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम है। उनसे मंसूब एक वाक्या इस त्यौहार की बुनियाद है। यह वाक्या यह है कि खुदा के हुक्म से उन्होंने अपने बेटे हजरत ईस्माइल अलैहिस्सलाम जो 97 सालों की दुआओं के बाद पैदा हुये उनको खुदा की राह में कुर्बान करने से ताल्लुक रखता है। खुदा ने हजरत इब्राहीम को ख्वाब में अपनी सबसे अजीज चीज कुर्बान करने का हुक्म दिया। हजरत इब्राहीम ने अपने तमाम जानवरों को खुदा की राह में कुर्बान कर दिया। यह ख्वाब दो मर्तबा हुआ। तीसरी मर्तबा हजरत इब्राहीम समझ गये कि खुदा उनसे प्यारे लाडले की कुर्बानी का तालिब है। यह अल्लाह की अजमाइश क...

इस्लाम में अहम फरीजा हज

चित्र
गोरखपुर। इस्लाम में पांच फर्जों में से हज एक अहम फरीजा है। जिसको जिदंगी में एक बार अदा करना जरूरी है। इस समय दुनिया के लाखों मुसलमान सऊदी अरब के मक्का शहर में मौजूद है। भारत से हजारों मुसलमान इस यात्रा के लिये गये है। जनपद में ढ़ाई सौ से ज्यादा लोग हज के सफर पर गये। हज के दौरान सभी मुसलमानों का एक लक्ष्य खुदा की रजा हासिल करना। क्या अमीर क्या गरीब सभी एक सफ में। देश की सीमायें यहां आकर खत्म हो जाती है। सभी मुसलमान अपने गुनाहों का माफी मांगते नजर आते है। इस माह इस्लाम के दो अहम काम किये जाते है एक हज और दूसरा कुर्बानी। आइये हमको बतातें है कि हज में होता क्या है। इस्लाम में इसकी अहमियत क्यूं है ? हज इस्लाम का आखिरी फरीजा है जिसे अल्लाह ने सन् 9 हिजरी में फर्ज फरमाया। जो मालदारों पर फर्ज है और वह भी जिंदगी में सिर्फ एक बार । अल्लाह तआला का इरशाद है कि अल्लाह तआला की रजा के लिये लोगों पर हज फर्ज है जो उसकी इसतिताअत रखे। (कुरआन) हज के फर्ज होने का सबब:- अल्लाह तआला ने पहली उम्मतों में हर उम्मत को रहबाानियत और सयाहत (आबादी से दूर जंगलों , पहाड़ों पर इबादत के लिये निकल जाना) का हुक्म दिया ...

साइकिल से तय किया मुकद्दस हज का सफर

चित्र
तत्कालीन प्रधानमंत्री ने जज्बे को सलाम करते हुए तत्काल बनवाया था पासपोर्ट गोरखपुर। जि़न्दगी भोर है सूरज सा निकलते रहो, एक ही पांव पर ठहरोगे तो थक जाओगे, धीरे-धीरे ही सही पर चलते रहो। इन्हीं पंक्तियों की तरह जोश जज़्बा व जुनून लिए अल्लाह के घर का तवाफ करने का (यानी हज ) पर जाने का इरादा शहर गोरखपुर के चन्द लोगांें ने उस वक्त किया जब मुल्कों का सफर बहुत कठिन था। पैसे के अभाव में लोग विदेश व हज करने कम ही जाते थे। हालांकि खुदा का घर देखने को इस हद तक मोहब्बत थी की शहर के 11 लोगांें ने हज करने का इरादा बनाया। इरादा तो बन गया कुछ एक को छोड़ बाकी के पास पासपोर्ट नहीं था। जिसकी सूचना तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु को मिली भारत सरकार ने इनके जज़्बे का सलाम करते हुए इनको पासपोर्ट मुहैया करायें। वाकया सन् 1953 का है जब भारत को आजाद हुए छ साल हुए थे। गोरखपुर के इस्माईलपुर मोहल्ले क ग्यारह लोगों ने सऊदी अरब की मुकद्दस हज यात्रा के लिए कमर कसी। जाने का जरिया बना साइकिल उस वक्त विदेश की यात्रा पानी की जहाज से की जाती थी लेकिन ग्यारह लोगों ने ठान ली थी कि साइकिल स...

मुुसलमान शोधकर्ता तकीउद्दीन (1526 ई.- 1585 ई.)

तकीउद्दीन सोलहवीं शताब्दी के महान जीनियस माने जाते हैं। सुनहरे इस्लामी युग के वह अंतिम वैज्ञानिक हैं जिन्होंने भौतिकी और भूगोल में परीक्षणों के साथ ऐसी-ऐसी चीजों का आविष्कार किया कि सुनकर विश्वास करना मुश्किल होता है। उनका जन्म 1526 ई. में सीरिया की राजधानी दमिश्क में हुआ। प्रारम्भिक शिक्षा वहीं प्राप्त की। वह संसार के प्रथम वैज्ञानिक हैं जिन्होंने स्अीम टर्बाइन और भाप का इंजन बनाया जिसका श्रेय आज जेम्स वाॅट को दिया जाता हैं। वह स्प्रिंग के प्रयोग से अच्छी तरह परिचित थे इसलिए पहली जेब घड़ी के अलावा अलार्म घड़ी और बड़े स्प्रिंग से स्वचालित खगोलिक घड़ी भी बनाई। उन्होंने पहली बार ऐसी घाडि़यों का आविष्कार किया जिनमें मिनट के अलावा सेकेण्ड का भी पता चलता था। भौतिकी में अपने परीक्षणों द्वारा उन्होंने छाया को सिद्ध किया और प्रकाश की गति का पता लगाया। खगोल विद्या के परीक्षणों के लिए उन्होंने तर्की की राजधानी इस्तम्बूल में अलदीन वैद्यशाला बनाई जहा उन्होंने कण की दूरी नापने का यंत्र बनाया, वहां उन्होंने खगोल विद्या सबंधी कई यंत्र तैयार किए। उन्होंने सोलहवीं शताब्दी की बिल्कुल सही ...

मुुसलमान शोधकर्ता जाबिर बिन हैयान (721 ई0 -815 ई0)

जाबिर बिन हैयान का जन्म इराक के कूफा शहर मंे हुआ। जाबिर बिन हैयान का रसायन का बाबा आदम कहा जाता है। आपने कूफा मंे अपनी प्रयोगशाला बनाई और रसायन विज्ञान में ऐसे-ऐसे शोध किए कि दुनिया आपको संसार का प्रथम रसायन वैज्ञानिक कहने लगी। जाबिर बिन हैयान जब छोटे थे तो उनके पिता को विद्रोह के आरोप में कत्ल कर दिया गया। अतः उनकी पढाई और पालन पोषण की जिम्मेदारी उनकी माता पर आ पड़ी। उनकी साहसिक माता अपने पुत्र को अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए प्रयासरत रहीं। जाबिर ने अन्थक परिश्रम और बुद्धी के बल पर विज्ञान के क्षेत्र में उच्च स्थान प्राप्त कर लिया। उन्होंने यूनानी भाषा सीखी और उसके पंडित बन गए। जाबिर ने यूनानी भाषा की कई कृतियों का अरबी भाषा में अनुवाद किया। परन्तु उन्हें रसायन शास्त्र से लगाव था। उन्होंने दूसरी विद्याओं पर भी पुस्तकंें लिखीं जिनमें तर्कशास्त्र, खगोल शास्त्र, दर्शन शास्त्र, भूविज्ञान, प्रतिछाया आदि शामिल है। जिस समय अब्बासी खलीफा हारून रशीद ने सिंहासन संभाला तो जाबिर बिन हैयान की कीर्ति शिखर पर थी। हारून रशीद ज्ञानियों को बड़ा सम्मान देता और संरक्षकता प्रदान करत...

महान मुस्लिम वैज्ञानिक जिन्होंने नवयुग की नींव रखी

अगर आपसे कहा जाए मुसलमान कोलम्बस से पांच सौ वर्ष पूर्व अमरीका पहुंच चुके थे। हवाई जहाज की कल्पना सबसे पहले कुरतुबा के एक मुसलमान अब्बास इब्ने फरनास ने नवीं शताब्दी में की और कुछ सेकण्ड उसका बनाया हुआ जहाज हवा में उड़ा भी। इसी वैज्ञानिक ने पहली घड़ी बनाई। मुसलमानों ने सबसे पहले खाने के लिए छुरी-कांटे का इस्तेमाल किया। कैमरे की कल्पना इब्नुल हैशम ने ग्यारहवीं शताब्दी में की। अरब मुसलमानों ने नहाने-धोने के लिए सबसे पहले सुगंधित साबुनों का प्रयोग किया। एक मुसलमान नेत्र विशेषज्ञ इब्नुल नफीस कठिन से कठिन आंख का आॅपरेशन कर सकता था। अलराजी ने सबसे पहले एल्कोहल को ऐन्टीसेप्टिक के तौर पर प्रयोग किया। पहला ग्लोब 1279 मंें अल-अरदी ने बनाया जो जर्मनी के शहर ड्रेस्डन के संग्रहालय में सुरक्षित है। बारहवीं शताब्दी में अरबी भाषा का वही महत्व था जो आज अंग्रेजी का है। ...तो क्या आप विश्वास करेंगे? लेकिन यह सत्य है। आज भी यूरोप के पुस्तकालयों में मुसलमानों द्वारा गणित, विज्ञान, भूगोल, भौतिक विज्ञान , जीव विज्ञान, भूगर्भ शास्त्र, आयुर्विज्ञान, दर्शनशास्त्र, समाज शास्त्र, अंतरिक्ष ज्ञान, संग...